आज के आधुनिक युग में बिजली (Electricity) हमारे दैनिक जीवन की रीढ़ बन चुकी है। घरों में उपयोग होने वाले पंखे, फ्रिज, एसी, वॉशिंग मशीन से लेकर बड़े-बड़े उद्योगों (Industries) में चलने वाली भारी मशीनरी तक—हर जगह इलेक्ट्रिकल उपकरणों पर हमारी निर्भरता लगातार बढ़ रही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये उपकरण बिजली का कितना प्रभावी उपयोग कर रहे हैं? यहीं पर एक महत्वपूर्ण इलेक्ट्रिकल कॉन्सेप्ट Power Factor की भूमिका शुरू होती है।
सरल शब्दों में कहें तो power factor kya hota hai और यह हमारी बिजली की खपत, बिल और सिस्टम की कार्यक्षमता को कैसे प्रभावित करता है—यह समझना आज के समय में बेहद जरूरी हो गया है। चाहे आप एक स्टूडेंट हों, इलेक्ट्रिशियन हों, इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हों या फिर एक सामान्य उपभोक्ता, Power Factor की सही जानकारी न सिर्फ तकनीकी समझ बढ़ाती है बल्कि बिजली की बचत और सिस्टम की बेहतर परफॉर्मेंस में भी मदद करती है।
इस लेख में हम Power Factor को आसान और व्यावहारिक भाषा में समझेंगे, ताकि इसकी अवधारणा हर पाठक के लिए स्पष्ट और उपयोगी बन सके।
Table of Contents
power factor kya hota hai | पावर फैक्टर क्या है?
पावर फैक्टर (Power Factor) यह दर्शाता है कि किसी इलेक्ट्रिकल सिस्टम में सप्लाई की गई बिजली का कितना हिस्सा वास्तव में उपयोगी कार्य (Useful Work) में बदल रहा है। तकनीकी रूप से, पावर फैक्टर वास्तविक शक्ति (Real Power – kW) और कुल आपूर्ति की गई शक्ति (Apparent Power – kVA) का अनुपात होता है।

पावर फैक्टर यह बताता है कि जो बिजली आपके सिस्टम तक पहुँच रही है, उसमें से कितनी बिजली सही तरीके से काम कर रही है और कितनी बेकार जा रही है। इसकी वैल्यू हमेशा 0 और 1 (या 0% से 100%) के बीच होती है। पावर फैक्टर जितना 1 के करीब होता है, उतना ही सिस्टम अधिक कुशल (Efficient) माना जाता है।
पावर फैक्टर को वोल्टेज और करंट के बीच के फेज एंगल (Phase Angle) के कोसाइन के रूप में परिभाषित किया जाता है। आदर्श स्थिति में AC सर्किट में वोल्टेज और करंट एक ही फेज में होते हैं, तब पावर फैक्टर 1 होता है। लेकिन व्यवहार में मोटर, ट्रांसफॉर्मर और इंडक्टिव लोड के कारण दोनों के बीच कोण बन जाता है, जिससे पावर फैक्टर घट जाता है।
उच्च पावर फैक्टर यह संकेत देता है कि विद्युत प्रणाली ऊर्जा का प्रभावी उपयोग कर रही है, जबकि कम पावर फैक्टर बिजली की हानि और कम दक्षता को दर्शाता है। यही कारण है कि पावर फैक्टर को बिजली प्रणाली की कार्यक्षमता मापने का एक महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है।
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पावर फैक्टर की परिभाषा (Definition of Power Factor)
पावर फैक्टर (Power Factor – PF) किसी AC (Alternating Current) विद्युत प्रणाली में वास्तविक रूप से उपयोग की गई शक्ति (Real Power – kW) और कुल आपूर्ति की गई शक्ति (Apparent Power – kVA) के बीच का अनुपात होता है। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि सप्लाई की गई विद्युत ऊर्जा का कितना भाग वास्तव में उपयोगी कार्य—जैसे मोटर घुमाना, मशीन चलाना या प्रकाश उत्पन्न करना—में परिवर्तित हो रहा है।
पावर फैक्टर का सूत्र (Formula of Power Factor)
Power Factor (PF) = Real Power (kW) ÷ Apparent Power (kVA)
या
Power Factor (PF)=cosθ
θ (थीटा) = वोल्टेज और करंट के बीच का कोण (Phase Angle)
AC सर्किट में वोल्टेज और करंट हमेशा एक ही समय पर अधिकतम नहीं होते। इनके बीच जो फेज अंतर (Phase Difference) पैदा होता है, वही यह तय करता है कि कितनी बिजली उपयोगी काम में लगेगी।

- Real Power (kW) → वह शक्ति जो वास्तव में कार्य करती है
- Apparent Power (kVA) → वह कुल शक्ति जो सप्लाई से ली जाती है
जब वोल्टेज और करंट के बीच कोण कम होता है, तो cosθ का मान 1 के करीब होता है और पावर फैक्टर अच्छा होता है।जैसे-जैसे यह कोण बढ़ता है, cosθ घटता है और पावर फैक्टर कम हो जाता है।
पावर फैक्टर का सरल उदाहरण
मान लीजिए किसी फैक्ट्री की मशीनें बिजली सप्लाई से 5 kVA ले रही हैं, लेकिन वास्तव में उनमें से केवल 4 kW शक्ति ही काम करने में उपयोग हो रही है।
तो पावर फैक्टर होगा: PF = 4 / 5 = 0.8
इसका सीधा-सा अर्थ है कि मशीन को मिलने वाली कुल बिजली में से 80% बिजली उपयोगी काम में लग रही है, जबकि बाकी 20% बिजली सिस्टम के अंदर चुंबकीय क्षेत्र बनाने या अनावश्यक रूप से सर्कुलेट होने में खर्च हो रही है। यही कारण है कि पावर फैक्टर यह समझने में मदद करता है कि बिजली का उपयोग कितनी कुशलता से किया जा रहा है।
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Power के प्रकार (Types of Power in AC Circuit)
Power Factor को सही तरह से समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि AC विद्युत प्रणाली में शक्ति केवल एक रूप में नहीं होती। भौतिकी और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के अनुसार, AC सर्किट में शक्ति को तीन अलग-अलग रूपों में समझा जाता है, क्योंकि वोल्टेज और करंट के बीच फेज अंतर मौजूद होता है। यही फेज अंतर शक्ति को वास्तविक, प्रतिक्रियाशील और प्रत्यक्ष रूप में विभाजित करता है।

वास्तविक शक्ति (Real / Active Power – kW)
वास्तविक शक्ति वह शक्ति है जो वास्तव में उपयोगी कार्य करती है। यही वह ऊर्जा है जो किसी विद्युत उपकरण को चलाने, घुमाने या प्रकाश उत्पन्न करने में सीधे रूप से खर्च होती है। जब बल्ब जलता है, पंखा घूमता है या हीटर गर्म होता है, तो उस प्रक्रिया में जो शक्ति खर्च होती है, वही वास्तविक शक्ति कहलाती है। तकनीकी दृष्टि से, यह शक्ति वोल्टेज और करंट के एक ही फेज में मौजूद घटक के कारण उत्पन्न होती है।
वास्तविक शक्ति को वाट (W) या किलोवाट (kW) में मापा जाता है और यही वह शक्ति है जिसके लिए उपभोक्ता को बिजली का बिल चुकाना पड़ता है।
प्रतिक्रियाशील शक्ति (Reactive Power – kVAR)
प्रतिक्रियाशील शक्ति वह शक्ति है जो किसी उपकरण के भीतर चुंबकीय या विद्युत क्षेत्र बनाने में लगती है। यह शक्ति मोटर, ट्रांसफॉर्मर और इंडक्टर जैसे उपकरणों के संचालन के लिए आवश्यक होती है, लेकिन स्वयं कोई प्रत्यक्ष कार्य नहीं करती। वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो यह शक्ति हर AC चक्र में स्रोत से लोड तक जाती है और फिर वापस लौट आती है। इसी कारण इसे “कार्य न करने वाली लेकिन आवश्यक शक्ति” माना जाता है।
प्रतिक्रियाशील शक्ति को वोल्ट-एम्पियर रिएक्टिव (VAR) या किलो-VAR (kVAR) में मापा जाता है। अनुभवी इंजीनियरों के अनुसार, प्रतिक्रियाशील शक्ति की अधिकता प्रणाली की दक्षता को कम कर देती है।
प्रत्यक्ष शक्ति (Apparent Power – kVA)
प्रत्यक्ष शक्ति वह कुल शक्ति होती है जो विद्युत आपूर्ति प्रणाली से ली जाती है। इसमें वास्तविक शक्ति और प्रतिक्रियाशील शक्ति दोनों शामिल होती हैं। यह शक्ति यह दर्शाती है कि सप्लाई सिस्टम, ट्रांसफॉर्मर और केबल पर कुल कितना भार पड़ रहा है। गणितीय रूप से, प्रत्यक्ष शक्ति वास्तविक शक्ति और प्रतिक्रियाशील शक्ति का सदिश (Vector) योग होती है।
यही कारण है कि विद्युत उपकरणों और ट्रांसफॉर्मरों की रेटिंग हमेशा kVA में दी जाती है, क्योंकि उन्हें कुल करंट वहन करना होता है, न कि केवल उपयोगी शक्ति।
kVA = √(kW² + kVAR²)
AC विद्युत प्रणाली में वास्तविक शक्ति कार्य करती है, प्रतिक्रियाशील शक्ति कार्य के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ बनाती है, और प्रत्यक्ष शक्ति सप्लाई सिस्टम पर कुल भार को दर्शाती है। इन तीनों शक्तियों का आपसी संबंध ही Power Factor की नींव बनाता है। इसलिए, Power के प्रकारों को समझे बिना किसी भी AC प्रणाली की दक्षता, प्रदर्शन और ऊर्जा उपयोग को सही रूप से समझना संभव नहीं है।
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Power Factor के प्रकार (Types of Power Factor)
AC विद्युत प्रणाली में Power Factor इस बात पर निर्भर करता है कि करंट और वोल्टेज के बीच फेज संबंध कैसा है। चूँकि अलग-अलग प्रकार के लोड (Inductive, Capacitive, Resistive) करंट के व्यवहार को बदल देते हैं, इसलिए Power Factor को व्यवहारिक रूप से कई प्रकारों में समझा जाता है। इन प्रकारों की पहचान विद्युत प्रणाली की दक्षता को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

Lagging Power Factor (लैगिंग पावर फैक्टर)
जब किसी AC सर्किट में करंट, वोल्टेज से पीछे (lag) चलता है, तब उस स्थिति को Lagging Power Factor कहा जाता है। यह स्थिति मुख्यतः इंडक्टिव लोड में पाई जाती है, जैसे मोटर, ट्रांसफॉर्मर, इंडक्शन फर्नेस और चोक। भौतिकी के अनुसार, इंडक्टर करंट में परिवर्तन का विरोध करता है, जिसके कारण करंट वोल्टेज के बाद प्रतिक्रिया करता है। व्यवहारिक अनुभव के आधार पर कहा जाए तो उद्योगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में सबसे अधिक लैगिंग पावर फैक्टर ही पाया जाता है। यदि यह मान 0.95 से कम हो, तो इसे विद्युत प्रणाली के लिए कमज़ोर या अप्रभावी माना जाता है।
Leading Power Factor (लीडिंग पावर फैक्टर)
जब किसी सर्किट में करंट, वोल्टेज से आगे (lead) चलता है, तब उसे Leading Power Factor कहा जाता है। यह स्थिति सामान्यतः कैपेसिटिव लोड के कारण उत्पन्न होती है, जैसे कैपेसिटर बैंक या ओवर-एक्साइटेड सिंक्रोनस मोटर। वैज्ञानिक रूप से, कैपेसिटर पहले चार्ज होता है और फिर करंट प्रवाहित करता है, जिससे करंट वोल्टेज से पहले प्रतिक्रिया देता है। व्यवहारिक रूप में Leading Power Factor का उपयोग अक्सर Lagging Power Factor को सुधारने के लिए किया जाता है, क्योंकि यह फेज अंतर को संतुलित करने में सहायक होता है।
Unity Power Factor (यूनिटी पावर फैक्टर)
जब वोल्टेज और करंट एक ही फेज में होते हैं, तब Power Factor का मान 1 (Unity) होता है। इसे Power Factor की आदर्श स्थिति माना जाता है। इस अवस्था में सप्लाई की गई लगभग पूरी बिजली उपयोगी कार्य में परिवर्तित हो जाती है और प्रतिक्रियाशील शक्ति नगण्य होती है। यह स्थिति प्रायः शुद्ध प्रतिरोधी (Resistive) लोड जैसे हीटर या इनकैंडेसेंट बल्ब में पाई जाती है। Unity Power Factor का अर्थ है अधिकतम दक्षता और न्यूनतम ऊर्जा हानि।
Lagging और Leading Power Factor, दोनों ही फेज अंतर के परिणाम हैं, जबकि Unity Power Factor उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ प्रणाली सबसे प्रभावी ढंग से कार्य कर रही होती है।
अच्छा Power Factor कितना होना चाहिए?
Power Factor की “अच्छी” या “खराब” सीमा कोई मनमाना नियम नहीं है, Power Factor जितना Unity (1.0) के करीब होगा, उतना ही विद्युत प्रणाली का उपयोग वैज्ञानिक रूप से अधिक कुशल माना जाता है।
आदर्श स्थिति (Ideal Power Factor): Power Factor = 1.0 को सबसे आदर्श और सर्वोत्तम स्थिति माना जाता है। इसका अर्थ है कि वोल्टेज और करंट पूरी तरह एक ही फेज में हैं और सप्लाई की गई लगभग पूरी विद्युत शक्ति उपयोगी कार्य में परिवर्तित हो रही है। इस स्थिति में प्रतिक्रियाशील शक्ति नगण्य होती है और ऊर्जा हानि न्यूनतम रहती है। व्यावहारिक रूप से यह स्थिति पूर्णतः प्रतिरोधी लोड में ही संभव होती है।
घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त Power Factor: घरेलू विद्युत उपकरणों में सामान्यतः Power Factor 0.95 से 1.0 के बीच होना अच्छा माना जाता है। इस रेंज में सिस्टम पर्याप्त रूप से कुशल रहता है और सप्लाई नेटवर्क पर अनावश्यक भार नहीं पड़ता। आधुनिक घरेलू उपकरण, जैसे इन्वर्टर, SMPS, AC और LED ड्राइव, आमतौर पर इसी स्तर को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किए जाते हैं।
इंडस्ट्रियल उपयोग के लिए उपयुक्त Power Factor: औद्योगिक विद्युत प्रणालियों में, जहाँ मोटर और ट्रांसफॉर्मर जैसे इंडक्टिव लोड अधिक होते हैं, 0.90 से ऊपर का Power Factor स्वीकार्य और सुरक्षित माना जाता है। 0.95 या उससे अधिक Power Factor को “अच्छा” माना जाता है, क्योंकि इससे लाइन करंट कम होता है, हानियाँ घटती हैं और उपकरणों की क्षमता का बेहतर उपयोग होता है।
Power Factor कम होने पर क्या संकेत मिलता है: यदि Power Factor 0.95 से नीचे चला जाए, तो यह दर्शाता है कि सिस्टम में विद्युत ऊर्जा का उपयोग प्रभावी रूप से नहीं हो रहा। 0.90 से नीचे का Power Factor खराब माना जाता है और 0.85 से कम होने पर इसे बहुत ही अप्रभावी स्थिति समझा जाता है। ऐसे मामलों में बिजली कंपनियाँ अतिरिक्त शुल्क या पेनल्टी भी लगाती हैं, क्योंकि नेटवर्क पर अनावश्यक रिएक्टिव करंट का भार बढ़ जाता है।
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Low Power Factor के नुकसान (Disadvantages of Low Power Factor)
जब किसी विद्युत प्रणाली का Power Factor कम होता है, तो इसका सीधा अर्थ यह होता है कि समान उपयोगी कार्य के लिए सिस्टम को अधिक करंट लेना पड़ता है। वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो करंट बढ़ने के साथ-साथ I²R हानियाँ तेज़ी से बढ़ती हैं, जिससे तारों और उपकरणों में अनावश्यक गर्मी पैदा होती है। यही गर्मी ऊर्जा के नुकसान (Power Loss) का मुख्य कारण बनती है।
कम Power Factor की स्थिति में विद्युत आपूर्ति से ली जाने वाली प्रत्यक्ष शक्ति (kVA) बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप केबल, ट्रांसफॉर्मर और स्विचगियर पर अतिरिक्त विद्युत और थर्मल लोड पड़ता है। इससे सिस्टम की वास्तविक वहन क्षमता कम हो जाती है और वही इंफ्रास्ट्रक्चर कम उपयोगी कार्य कर पाता है। व्यावहारिक अनुभव के अनुसार, ऐसे सिस्टम जल्दी ओवरलोड की स्थिति में पहुँच जाते हैं।
आर्थिक दृष्टि से भी Low Power Factor हानिकारक होता है। अधिक करंट और अधिक kVA डिमांड के कारण बिजली बिल बढ़ जाता है, विशेषकर औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए। कई बिजली वितरण कंपनियाँ 0.95 से कम Power Factor पर Penalty लगाती हैं, क्योंकि कम Power Factor पूरे वितरण नेटवर्क की दक्षता को प्रभावित करता है।
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High Power Factor के फायदे (Advantages of High Power Factor)
जब Power Factor अधिक होता है, विशेषकर 0.95 से ऊपर, तो यह दर्शाता है कि विद्युत प्रणाली सप्लाई की गई ऊर्जा का अधिकांश भाग उपयोगी कार्य में बदल रही है। वैज्ञानिक रूप से इसका अर्थ है कि करंट का स्तर कम रहता है और वोल्टेज-करंट का फेज संबंध अधिक संतुलित होता है। इसके कारण ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लॉस में उल्लेखनीय कमी आती है।
उच्च Power Factor की स्थिति में केबल, ट्रांसफॉर्मर और अन्य उपकरण कम विद्युत तनाव में काम करते हैं। इससे उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है और तापीय तनाव घटने के कारण उपकरणों की आयु (Life) भी बढ़ जाती है। यही कारण है कि अच्छी तरह डिज़ाइन की गई औद्योगिक प्रणालियाँ हमेशा High Power Factor को लक्ष्य बनाती हैं।
आर्थिक रूप से, High Power Factor सीधे-सीधे बिजली की बचत और कम बिल में बदलता है। कम kVA डिमांड के कारण न केवल पेनल्टी से बचाव होता है, बल्कि मौजूदा सिस्टम से अधिक उपयोगी आउटपुट भी प्राप्त किया जा सकता है। High Power Factor किसी भी विद्युत प्रणाली की स्वस्थ और कुशल कार्यप्रणाली का स्पष्ट संकेत होता है।
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Power Factor कम क्यों होता है?
Power Factor कम होने का मूल कारण यह है कि किसी विद्युत प्रणाली में उपयोगी शक्ति (kW) की तुलना में प्रतिक्रियाशील शक्ति (kVAR) की मात्रा बढ़ जाती है। AC सिस्टम में जैसे ही वोल्टेज और करंट के बीच फेज अंतर बढ़ता है, Power Factor घटने लगता है। यह समस्या विशेष रूप से उन प्रणालियों में दिखाई देती है जहाँ चुंबकीय क्षेत्र बनाने वाले उपकरणों का उपयोग अधिक होता है।
इंडक्टिव लोड का प्रभाव
इंडक्शन मोटर, ट्रांसफॉर्मर, चोक और हीटिंग फर्नेस जैसे उपकरण इंडक्टिव लोड की श्रेणी में आते हैं। इन उपकरणों को कार्य करने के लिए पहले चुंबकीय क्षेत्र बनाना पड़ता है, जिसके लिए वे बड़ी मात्रा में रिएक्टिव पावर लेते हैं। भौतिकी के अनुसार, इंडक्टर करंट में परिवर्तन का विरोध करता है, जिसके कारण करंट वोल्टेज से पीछे रह जाता है। यही lagging current Power Factor को कम करने का सबसे बड़ा कारण बनता है।
कम लोड पर उपकरणों का संचालन
जब मोटर या ट्रांसफॉर्मर कम लोड पर चलते हैं, तब भी उन्हें लगभग उतनी ही चुंबकीय धारा (magnetizing current) की आवश्यकता होती है। ऐसे में वास्तविक शक्ति कम हो जाती है, लेकिन प्रतिक्रियाशील शक्ति लगभग बनी रहती है। परिणामस्वरूप Power Factor बहुत गिर सकता है, कई मामलों में यह 0.2 तक भी पहुँच जाता है। यही कारण है कि ओवर-साइज़्ड मोटर अक्सर कम Power Factor का कारण बनती हैं।
परिवर्तनीय और असंतुलित लोड
जब किसी सिस्टम में लोड लगातार बदलता रहता है, विशेषकर जब लोड कम होता है, तब Power Factor स्थिर नहीं रह पाता। औद्योगिक संयंत्रों में मशीनों का बार-बार चालू और बंद होना या उत्पादन में उतार-चढ़ाव होने से Power Factor गिरता है। यह प्रभाव ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पर अतिरिक्त तनाव डालता है।
दोषपूर्ण या पुराना विद्युत उपकरण
पुरानी या खराब स्थिति वाली मोटरों और ट्रांसफॉर्मरों में एयर गैप बढ़ जाना, वाइंडिंग लॉस या कोर लॉस अधिक हो जाना आम बात है। इससे चुंबकीय क्षेत्र बनाए रखने के लिए अधिक रिएक्टिव करंट की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे उपकरण Power Factor को लगातार खराब करते रहते हैं, भले ही वे सही तरह से चलते हुए दिखाई दें।
गैर-रैखिक (Non-linear) लोड का प्रभाव
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे VFDs, SMPS, और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स आधारित सिस्टम करंट को साइन वेव के रूप में नहीं खींचते। इससे करंट वेवफॉर्म में हार्मोनिक्स उत्पन्न होते हैं, जो प्रभावी रूप से Power Factor को और कम कर देते हैं। यहाँ केवल फेज अंतर ही नहीं, बल्कि वेवफॉर्म विकृति भी Power Factor गिरने का कारण बनती है।
कम Power Factor = अधिक रिएक्टिव करंट + कम ऊर्जा दक्षता
Power Factor सुधारने के तरीके (Power Factor Improvement Methods)
जब किसी विद्युत प्रणाली में Power Factor कम हो जाता है, तो इसका अर्थ होता है कि सिस्टम आवश्यकता से अधिक रिएक्टिव पावर खींच रहा है। Power Factor सुधारने का उद्देश्य यही होता है कि इंडक्टिव लोड द्वारा उत्पन्न लैगिंग करंट को संतुलित किया जाए और वोल्टेज-करंट का फेज संबंध बेहतर बनाया जाए। इसके लिए व्यवहार में कुछ सिद्ध और प्रभावी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

Capacitor Bank का उपयोग
Capacitor Bank Power Factor सुधारने का सबसे आम, विश्वसनीय और किफायती तरीका माना जाता है। कैपेसिटर स्वाभाविक रूप से लीडिंग करंट प्रदान करते हैं, जो इंडक्टिव लोड (जैसे मोटर और ट्रांसफॉर्मर) के कारण उत्पन्न लैगिंग करंट को संतुलित करता है। वैज्ञानिक रूप से यह प्रक्रिया रिएक्टिव पावर की स्थानीय पूर्ति करती है, जिससे सप्लाई लाइन से ली जाने वाली kVAR घट जाती है। यही कारण है कि इंडस्ट्रियल और कमर्शियल प्रतिष्ठानों में कैपेसिटर बैंक को लोड के समानांतर लगाया जाता है। सही आकार का कैपेसिटर बैंक लगाने से Power Factor तेज़ी से 0.95 या उससे ऊपर लाया जा सकता है।
Automatic Power Factor Correction (APFC) Panel
जहाँ लोड लगातार बदलता रहता है, वहाँ स्थिर कैपेसिटर पर्याप्त नहीं होते। ऐसी प्रणालियों में APFC पैनल का उपयोग किया जाता है। यह सिस्टम वास्तविक समय में Power Factor को मापता है और आवश्यकता के अनुसार कैपेसिटर स्टेप्स को स्वतः चालू या बंद करता है। यह तरीका अधिक सटीक और सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि इससे ओवर-कम्पनसेशन की समस्या नहीं होती। आधुनिक औद्योगिक संयंत्रों में APFC पैनल Power Factor प्रबंधन का मानक समाधान बन चुका है।
Synchronous Condenser का उपयोग
Synchronous Condenser वास्तव में एक ओवर-एक्साइटेड सिंक्रोनस मोटर होती है, जो बिना किसी यांत्रिक लोड के चलाई जाती है। यह आवश्यकतानुसार रिएक्टिव पावर को अवशोषित या उत्पन्न कर सकती है, जिससे Power Factor का stepless और सटीक नियंत्रण संभव होता है। यह तरीका अत्यंत प्रभावी है, लेकिन इसकी लागत और रखरखाव अधिक होने के कारण इसका उपयोग मुख्यतः बड़ी औद्योगिक इकाइयों और पावर सिस्टम में किया जाता है।
Phase Advancer का उपयोग
Phase Advancer विशेष रूप से इंडक्शन मोटरों के लिए उपयोगी होता है। यह मोटर की रोटर सर्किट को आवश्यक एक्साइटेशन प्रदान करता है, जिससे मोटर द्वारा ली जाने वाली रिएक्टिव पावर कम हो जाती है। परिणामस्वरूप करंट और वोल्टेज के बीच का फेज अंतर घटता है और Power Factor में सुधार होता है। यह तरीका मोटर-विशिष्ट अनुप्रयोगों में प्रभावी है, लेकिन सामान्य उपयोग में कैपेसिटर बैंक जितना लोकप्रिय नहीं है।
सही क्षमता के उपकरणों का चयन
बहुत अधिक रेटिंग वाली मोटरों को कम लोड पर चलाने से Power Factor खराब हो जाता है। इसलिए उचित क्षमता (proper rating) के उपकरणों का चयन भी Power Factor सुधारने का एक अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण तरीका है। सही लोडिंग पर उपकरण अधिक कुशलता से कार्य करते हैं और अनावश्यक रिएक्टिव करंट नहीं खींचते।
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घरेलू उपयोग में Power Factor
घरेलू विद्युत उपयोग में Power Factor एक तकनीकी विषय होते हुए भी आम उपभोक्ता के लिए लगभग अदृश्य रहता है, क्योंकि घरों में उपयोग होने वाले अधिकांश उपकरण छोटे इंडक्टिव लोड होते हैं। पंखा, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और वॉशिंग मशीन जैसे उपकरणों में मोटर लगी होती है, और मोटर के कारण करंट वोल्टेज से थोड़ा पीछे चलता है। इसी वजह से घरेलू Power Factor सामान्यतः हल्का Lagging होता है।
इन उपकरणों को कार्य करने के लिए चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता होती है, जिसके लिए वे कुछ मात्रा में रिएक्टिव पावर लेते हैं। इससे Power Factor 1 से थोड़ा कम हो जाता है, लेकिन चूँकि घरेलू लोड अपेक्षाकृत छोटा और बिखरा हुआ होता है, इसलिए इसका प्रभाव बिजली आपूर्ति प्रणाली पर गंभीर नहीं पड़ता।
घरेलू उपभोक्ताओं का Power Factor आमतौर पर 0.9 के आसपास या उससे ऊपर रहता है, विशेषकर आधुनिक उपकरणों में जहाँ डिज़ाइन स्तर पर ही दक्षता पर ध्यान दिया जाता है। इसी कारण घरेलू बिजली मीटर सामान्यतः केवल वास्तविक ऊर्जा (kWh) को मापते हैं, न कि kVA या Power Factor को।
यही वजह है कि घरेलू उपभोक्ताओं पर Power Factor के लिए पेनल्टी नहीं लगाई जाती। बिजली वितरण कंपनियाँ Power Factor नियंत्रण को मुख्यतः औद्योगिक और बड़े वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के लिए आवश्यक मानती हैं, जहाँ लोड बड़ा होता है और कम Power Factor पूरे नेटवर्क को प्रभावित कर सकता है।
घरों में Power Factor को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती, जब तक कि उपकरण सामान्य रूप से कार्य कर रहे हों। आधुनिक घरेलू विद्युत प्रणालियाँ अपने आप एक स्वीकार्य और संतुलित Power Factor बनाए रखती हैं।
इंडस्ट्री में Power Factor का महत्व
औद्योगिक विद्युत प्रणालियों में Power Factor केवल एक तकनीकी मान नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे लागत, दक्षता और अनुपालन (compliance) से जुड़ा हुआ विषय है। बड़े पैमाने पर मोटर, ट्रांसफॉर्मर और भारी मशीनरी के उपयोग के कारण इंडस्ट्री में Power Factor का प्रभाव घरेलू उपयोग की तुलना में कहीं अधिक गहरा होता है।
बिजली बिल पर सीधा प्रभाव
इंडस्ट्री में Power Factor का सबसे पहला और स्पष्ट असर बिजली बिल पर पड़ता है। जब Power Factor कम होता है, तो समान वास्तविक कार्य (kW) के लिए सिस्टम को अधिक प्रत्यक्ष शक्ति (kVA) लेनी पड़ती है। वैज्ञानिक रूप से इसका अर्थ है कि करंट बढ़ जाता है, जिससे सप्लाई सिस्टम पर भार बढ़ता है। कई औद्योगिक उपभोक्ताओं का बिल kVA डिमांड के आधार पर तय किया जाता है, इसलिए कम Power Factor सीधे-सीधे अधिक बिल में बदल जाता है।
डिस्कॉम द्वारा Power Factor Penalty
बिजली वितरण कंपनियाँ (DISCOMs) पूरे नेटवर्क की स्थिरता और दक्षता बनाए रखने के लिए उच्च Power Factor की अपेक्षा करती हैं। यदि किसी उद्योग का Power Factor निर्धारित सीमा, आमतौर पर 0.95 से नीचे, चला जाता है, तो उस पर PF Penalty लगाई जाती है। यह पेनल्टी इस बात का संकेत है कि उद्योग वितरण नेटवर्क पर अनावश्यक रिएक्टिव करंट का भार डाल रहा है। अनुभवी दृष्टिकोण से देखें तो यह पेनल्टी कोई सज़ा नहीं, बल्कि सिस्टम अनुशासन बनाए रखने का तकनीकी उपाय है।
Power Factor सुधार का अनिवार्य होना
औद्योगिक स्तर पर Power Factor सुधार कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य तकनीकी आवश्यकता बन चुका है। बड़े लोड, लगातार बदलती मशीनरी और भारी इंडक्टिव उपकरणों के कारण Power Factor को नियंत्रण में रखने के लिए सुधारात्मक उपाय आवश्यक होते हैं। इसी कारण अधिकांश उद्योगों में कैपेसिटर बैंक या स्वचालित सुधार प्रणालियाँ लगाना मानक अभ्यास माना जाता है। यह न केवल पेनल्टी से बचाता है, बल्कि मौजूदा विद्युत इंफ्रास्ट्रक्चर की उपयोगी क्षमता को भी बढ़ाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. क्या Power Factor बढ़ाने से बिजली की खपत कम होती है?
हाँ, Power Factor बढ़ाने से बिजली की खपत (यूनिट/kWh) सीधे कम नहीं होती, क्योंकि यूनिट वास्तविक शक्ति (Real Power) पर आधारित होती हैं। लेकिन जब Power Factor बेहतर होता है, तो उसी काम के लिए सिस्टम को कम करंट और कम kVA लेना पड़ता है। इसका वैज्ञानिक परिणाम यह होता है कि लाइन लॉस, ट्रांसफॉर्मर लॉस और अनावश्यक रिएक्टिव पावर घट जाती है, जिससे बिजली का नुकसान कम होता है और कुल बिजली बिल घट जाता है, खासकर इंडस्ट्रियल और कमर्शियल उपभोक्ताओं के लिए। अनुभवी दृष्टिकोण से कहा जाए तो Power Factor सुधार ऊर्जा बचत नहीं, बल्कि ऊर्जा के बेहतर और कुशल उपयोग का उपाय है।
2. पावर फैक्टर कैसे मापा जाता है?
वोल्टेज और करंट के बीच के फेज अंतर (Phase Difference) के कोसाइन (cosine) को ही पावर फैक्टर (Power Factor) कहा जाता है। इसलिए पावर फैक्टर को वोल्टेज और करंट के बीच बने कोण के आधार पर मापा जाता है।
गणितीय रूप से, पावर फैक्टर को निम्न सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है:
Power Factor = cos θ
जहाँ θ वोल्टेज और करंट के बीच का फेज कोण होता है।
3. Power Factor की यूनिट क्या है?
Power Factor की कोई इकाई नहीं होती। परिभाषा के अनुसार, पावर फैक्टर एसी सर्किट में प्रतिरोध (Resistance) और इम्पीडेंस (Impedance) के अनुपात से संबंधित होता है। चूँकि प्रतिरोध और इम्पीडेंस दोनों की इकाई ओम (Ω) होती है, इसलिए इनके अनुपात से प्राप्त मान इकाई रहित (Unitless / Dimensionless) होता है।
इसके अलावा, पावर फैक्टर को आमतौर पर वोल्टेज और करंट के बीच फेज कोण (θ) के कोसाइन के रूप में भी व्यक्त किया जाता है: Power Factor = cos θ
क्योंकि कोसाइन का मान भी किसी इकाई में नहीं होता
4. सिंगल फेज मोटर का पावर फैक्टर कितना होता है?
सिंगल फेज मोटर का पावर फैक्टर सामान्यतः लैगिंग (Lagging) होता है और यह मोटर पर लगे लोड पर निर्भर करता है। नो-लोड या हल्के लोड की स्थिति में इसका पावर फैक्टर काफ़ी कम, लगभग 0.2 से 0.4 के बीच होता है, जबकि फुल लोड पर यह बढ़कर लगभग 0.6 से 0.8 तक पहुँच सकता है। क्योंकि सिंगल फेज मोटर इंडक्टिव प्रकृति की होती है, इसलिए इसमें करंट वोल्टेज से पीछे रहता है। कैपेसिटर-स्टार्ट या कैपेसिटर-रन मोटरों में पावर फैक्टर तुलनात्मक रूप से बेहतर होता है, क्योंकि कैपेसिटर फेज अंतर को कम करके मोटर की दक्षता सुधारने में मदद करता है।
धन्यवाद! हमें उम्मीद है कि यह पोस्ट ”Power factor kya hota hai ” आपके लिए जानकारीपूर्ण और मददगार रही होगी। अगर आपके कोई विचार, अनुभव या सवाल हैं, तो उन्हें नीचे कमेंट में शेयर करना न भूलें

