आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया में डायोड (Diode) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मूलभूत इलेक्ट्रॉनिक घटक है। वास्तव में, डायोड के बिना किसी भी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की कल्पना करना लगभग असंभव है। चाहे वह मोबाइल फोन, टीवी, कंप्यूटर, चार्जर, सोलर पैनल, कारों के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम या मेडिकल उपकरण हों—हर जगह डायोड किसी न किसी रूप में उपयोग किया जाता है।
डायोड का मुख्य कार्य विद्युत धारा को एक ही दिशा में प्रवाहित होने देना होता है, जिससे सर्किट सुरक्षित, नियंत्रित और सही तरीके से काम कर पाता है। इसी कारण डायोड को इलेक्ट्रॉनिक्स की आधारशिला भी कहा जाता है।
इस लेख में हम सरल लेकिन प्रभावी तरीके से समझेंगे कि डायोड क्या है, डायोड कैसे काम करता है, डायोड के प्रकार, डायोड के प्रमुख कार्य, डायोड के उपयोग, तथा PN जंक्शन डायोड का सिद्धांत क्या है, ताकि शुरुआती विद्यार्थी से लेकर तकनीकी रुचि रखने वाला हर पाठक इसे आसानी से समझ सके।
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डायोड क्या होता है? (Diode Definition in Hindi)
डायोड एक दो-टर्मिनल वाला अर्धचालक (Semiconductor) इलेक्ट्रॉनिक घटक है, जो विद्युत धारा (Electric Current) को केवल एक ही दिशा में प्रवाहित होने देता है और विपरीत दिशा में धारा के प्रवाह को रोक देता है।
डायोड के दो सिरे (टर्मिनल) होते हैं:
- एनोड (Anode) – धनात्मक (+) सिरा
- कैथोड (Cathode) – ऋणात्मक (–) सिरा
जब एनोड को धनात्मक और कैथोड को ऋणात्मक वोल्टेज दिया जाता है, तो डायोड धारा को बहने देता है। लेकिन यदि वोल्टेज की दिशा उलट दी जाए, तो डायोड धारा को रोक देता है।
इसी विशेषता के कारण डायोड को अक्सर इलेक्ट्रॉनिक वन-वे वाल्व कहा जाता है। जैसे पानी का वाल्व एक दिशा में पानी जाने देता है और दूसरी दिशा में रोक देता है, उसी प्रकार डायोड करंट को एक ही दिशा में प्रवाहित होने देता है।
डायोड का यह गुण इलेक्ट्रॉनिक सर्किट को सुरक्षित रखने, AC को DC में बदलने (Rectification) और गलत दिशा में आने वाली धारा से उपकरणों को बचाने में बहुत उपयोगी होता है।
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डायोड का इतिहास (History of Diode)
डायोड का इतिहास लगभग 19वीं सदी के अंत से शुरू होता है, जब वैज्ञानिकों ने पहली बार यह देखा कि कुछ पदार्थ विद्युत धारा को केवल एक ही दिशा में प्रवाहित होने देते हैं। यही खोज आगे चलकर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की नींव बनी। 1874 में फर्डिनेंड ब्रौन ने क्रिस्टल खनिजों में एकतरफा करंट प्रवाह की खोज की। इसके बाद 1880 में थॉमस एडिसन ने वैक्यूम ट्यूब में इलेक्ट्रॉनों के एक दिशा में बहने का प्रभाव देखा, जिसे एडिसन प्रभाव कहा गया।
1904 में सर जॉन एम्ब्रोस फ्लेमिंग ने पहले वैक्यूम ट्यूब डायोड का आविष्कार किया, जिसका उपयोग AC को DC में बदलने के लिए किया गया। 1940–1950 के दशक में रसेल ओह्ल ने PN जंक्शन डायोड की खोज की, जिससे सेमीकंडक्टर डायोड का विकास हुआ। 1962 में निक होलोन्याक ने पहला LED डायोड बनाया।
आज डायोड वैक्यूम ट्यूब से लेकर आधुनिक नैनो-स्केल सेमीकंडक्टर तकनीक तक विकसित हो चुका है और लगभग हर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में उपयोग किया जाता है।
डायोड की संरचना (Diode Construction)
डायोड की संरचना का आधार PN जंक्शन होता है। अधिकांश डायोड अर्धचालक पदार्थों जैसे सिलिकॉन, जर्मेनियम या गैलियम आर्सेनाइड से बनाए जाते हैं, जिनमें सिलिकॉन सबसे अधिक प्रचलित है क्योंकि यह सस्ता, टिकाऊ और उच्च तापमान पर भी अच्छा कार्य करता है।
डायोड बनाने के लिए दो अलग-अलग प्रकार के अर्धचालक तैयार किए जाते हैं—P-टाइप और N-टाइप।
P-टाइप सेमीकंडक्टर में त्रिसंयोजक अशुद्धियाँ (जैसे बोरॉन या गैलियम) मिलाई जाती हैं, जिससे इसमें होल (छिद्र) अधिक हो जाते हैं। यह भाग धनात्मक प्रकृति का होता है और इसे एनोड (Anode) कहा जाता है।
N-टाइप सेमीकंडक्टर में पंचसंयोजक अशुद्धियाँ (जैसे फॉस्फोरस या आर्सेनिक) मिलाई जाती हैं, जिससे इसमें इलेक्ट्रॉन अधिक होते हैं। यह भाग ऋणात्मक होता है और इसे कैथोड (Cathode) कहा जाता है।
जब P-टाइप और N-टाइप पदार्थों को आपस में जोड़ा जाता है, तो उनके बीच PN जंक्शन बनता है। इस जंक्शन पर इलेक्ट्रॉन और होल आपस में मिलकर एक पतली परत बनाते हैं, जिसे रिक्तीकरण परत (Depletion Layer) कहा जाता है। इस परत में मुक्त चार्ज कैरियर बहुत कम होते हैं, इसलिए यह उच्च प्रतिरोध (Resistance) प्रदान करती है और बिना बाहरी वोल्टेज के धारा को बहने से रोकती है।
डायोड के दोनों सिरों पर धातु के इलेक्ट्रोड (टर्मिनल) लगाए जाते हैं, जिससे इसे सर्किट में जोड़ा जा सके। यही सरल लेकिन वैज्ञानिक संरचना डायोड को करंट को केवल एक दिशा में प्रवाहित करने योग्य बनाती है।
संक्षेप में, डायोड की संरचना—P-टाइप, N-टाइप और उनके बीच बना PN जंक्शन—ही वह मुख्य कारण है, जिसकी वजह से डायोड आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में इतना उपयोगी और आवश्यक घटक बन जाता है।
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रिक्तीकरण परत (Depletion Layer in Diode) क्या है?
रिक्तीकरण परत, PN जंक्शन डायोड में बनने वाला वह विशेष क्षेत्र है जहाँ कोई भी मुक्त आवेश वाहक (इलेक्ट्रॉन और होल) मौजूद नहीं होते। यह परत डायोड की कार्यप्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण भाग होती है, क्योंकि यही धारा के प्रवाह को नियंत्रित करती है। रिक्तीकरण परत PN जंक्शन डायोड का वह केंद्रीय भाग है जो डायोड को एक दिशा में करंट बहाने योग्य बनाता है। इसी परत की वजह से डायोड इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में नियंत्रण और सुरक्षा प्रदान करता है।
रिक्तीकरण परत कैसे बनती है?
जब P-टाइप और N-टाइप सेमीकंडक्टर को आपस में जोड़ा जाता है, तो दोनों में मौजूद आवेश वाहक एक-दूसरे की ओर बढ़ने लगते हैं।
- N-टाइप क्षेत्र से इलेक्ट्रॉन P-टाइप क्षेत्र की ओर जाते हैं
- P-टाइप क्षेत्र से होल N-टाइप क्षेत्र की ओर जाते हैं
जंक्शन के पास पहुँचकर इलेक्ट्रॉन और होल आपस में मिल जाते हैं और निष्क्रिय (Neutral) हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप जंक्शन के आसपास ऐसा क्षेत्र बन जाता है जहाँ मुक्त चार्ज कैरियर समाप्त हो जाते हैं। इसी क्षेत्र को रिक्तीकरण परत (Depletion Layer) कहा जाता है।
रिक्तीकरण परत की संरचना
रिक्तीकरण परत में मुक्त इलेक्ट्रॉन और होल नहीं रहते, लेकिन वहाँ कुछ अचल (स्थिर) आयन मौजूद होते हैं:
- N-साइड पर → धनात्मक दाता आयन
- P-साइड पर → ऋणात्मक स्वीकर्ता आयन
इन स्थिर आयनों के कारण रिक्तीकरण परत में एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र (Internal Electric Field) उत्पन्न होता है।
रिक्तीकरण परत का कार्य
- आवेश वाहकों के आगे प्रसार (Diffusion) को रोकना
- डायोड में धारा के प्रवाह को नियंत्रित करना
- बिना बाहरी वोल्टेज के करंट को बहने से रोकना
चूँकि इस परत में मुक्त चार्ज नहीं होते, इसलिए यह एक उच्च प्रतिरोध (High Resistance) वाले क्षेत्र की तरह व्यवहार करती है और कुचालक (Insulator) के समान कार्य करती है।
रिक्तीकरण परत की चौड़ाई किस पर निर्भर करती है?
रिक्तीकरण परत की मोटाई या चौड़ाई निम्न बातों पर निर्भर करती है:
- P-टाइप और N-टाइप पदार्थों का डोपिंग स्तर
- जंक्शन पर लगाया गया बाहरी वोल्टेज
अलग-अलग परिस्थितियों में यह परत पतली या मोटी हो सकती है, जिससे डायोड (Diode) का व्यवहार बदलता है।
सरल शब्दों में समझें: रिक्तीकरण परत (Depletion Layer) को आप एक इलेक्ट्रॉनिक दीवार की तरह समझ सकते हैं, जो बिना अनुमति करंट को आगे नहीं बढ़ने देती। जब तक सही दिशा में और पर्याप्त वोल्टेज नहीं लगाया जाता, यह परत धारा को रोककर रखती है।
डायोड कैसे काम करता है? (Working of Diode in Hindi)
डायोड (Diode) के कार्य करने का सिद्धांत मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि डायोड पर वोल्टेज किस दिशा में लगाया गया है। इसी आधार पर डायोड की कार्यप्रणाली को दो भागों में समझा जाता है—फॉरवर्ड बायस और रिवर्स बायस।
1. फॉरवर्ड बायस (Forward Bias)
फॉरवर्ड बायस (Forward Bias) की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब डायोड के P-टाइप क्षेत्र को बैटरी के धनात्मक (Positive) टर्मिनल से और N-टाइप क्षेत्र को ऋणात्मक (Negative) टर्मिनल से जोड़ा जाता है। इस कनेक्शन के कारण जंक्शन पर बनी डिप्लीशन लेयर पतली होने लगती है। P-क्षेत्र में मौजूद होल्स और N-क्षेत्र में मौजूद इलेक्ट्रॉन जंक्शन की ओर गति करते हैं, जिससे उनके बीच की बाधा कम हो जाती है। परिणामस्वरूप डायोड का आंतरिक प्रतिरोध घट जाता है और वह धारा प्रवाहित करने की स्थिति में आ जाता है।
हालाँकि, फॉरवर्ड बायस में भी डायोड तुरंत चालक नहीं बनता। धारा के प्रवाह के लिए एक न्यूनतम वोल्टेज आवश्यक होता है जिसे थ्रेशोल्ड वोल्टेज या कट-इन वोल्टेज कहा जाता है। सिलिकॉन डायोड के लिए यह वोल्टेज लगभग 0.6 से 0.7 वोल्ट होता है, जबकि जर्मेनियम डायोड के लिए यह लगभग 0.3 वोल्ट होता है। इस सीमा को पार करने के बाद डायोड में धारा तेजी से बढ़ती है।
इसी गुण का उपयोग रेक्टिफिकेशन में किया जाता है, जहाँ AC सप्लाई के धनात्मक चक्र के दौरान डायोड धारा को प्रवाहित होने देता है।
2. रिवर्स बायस (Reverse Bias)
रिवर्स बायस (Reverse Bias) की स्थिति तब होती है जब डायोड के P-टाइप क्षेत्र को बैटरी के ऋणात्मक (Negative) टर्मिनल से और N-टाइप क्षेत्र को धनात्मक (Positive) टर्मिनल से जोड़ा जाता है। इस अवस्था में जंक्शन पर मौजूद डिप्लीशन लेयर और अधिक चौड़ी हो जाती है। इलेक्ट्रॉन और होल्स जंक्शन से दूर खिंच जाते हैं, जिससे चार्ज कैरियर्स का प्रवाह लगभग समाप्त हो जाता है। परिणामस्वरूप डायोड का प्रतिरोध बहुत अधिक हो जाता है और वह धारा के प्रवाह को रोक देता है।
रिवर्स बायस की स्थिति में सामान्यतः डायोड से करंट नहीं बहता, लेकिन वास्तव में एक अत्यंत छोटा लीकेज करंट मौजूद होता है। प्रत्येक डायोड की एक अधिकतम रिवर्स वोल्टेज सहन क्षमता होती है, जिसे पीक इन्वर्स वोल्टेज (PIV) कहा जाता है। यदि लगाया गया रिवर्स वोल्टेज इस सीमा से अधिक हो जाए, तो डायोड ब्रेकडाउन की अवस्था में प्रवेश कर सकता है। इस स्थिति में अचानक बहुत अधिक करंट बहने लगता है, जो सामान्य डायोड के लिए हानिकारक होता है और उसे स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकता है।
पीक इन्वर्स वोल्टेज (PIV) और ब्रेकडाउन
हर डायोड की एक सीमा होती है कि वह कितना अधिक रिवर्स वोल्टेज सहन कर सकता है। इसे पीक इन्वर्स वोल्टेज (PIV – Peak Inverse Voltage) कहते हैं।
- PIV का मतलब है वह अधिकतम रिवर्स वोल्टेज, जिसे डायोड नुकसान या विफल हुए बिना झेल सकता है।
- यदि रिवर्स वोल्टेज इस सीमा से अधिक हो जाता है, तो डायोड की डिप्लीशन लेयर टूट जाती है और अत्यधिक करंट बहने लगता है। इसे ब्रेकडाउन (Breakdown) कहते हैं।
ब्रेकडाउन के प्रकार
1. एवलांच ब्रेकडाउन (Avalanche Breakdown)
- यह तब होता है जब रिवर्स वोल्टेज बहुत अधिक हो जाता है।
- इस स्थिति में जंक्शन पर इलेक्ट्रॉन्स इतनी ऊर्जा प्राप्त कर लेते हैं कि वे अन्य इलेक्ट्रॉन्स को भी मुक्त कर देते हैं।
- परिणामस्वरूप, एक चेन रिएक्शन शुरू हो जाती है, और अचानक बहुत अधिक करंट बहने लगता है।
- सामान्य डायोड में यह हानिकारक होता है और डायोड को नुकसान पहुंचा सकता है।
2. जेनर ब्रेकडाउन (Zener Breakdown)
- यह नियंत्रित तरीके से होता है, और विशेष रूप से Zener Diode में उपयोग किया जाता है।
- जब रिवर्स वोल्टेज जेनर डायोड की विशेष ब्रेकडाउन वोल्टेज तक पहुँचता है, डायोड नियंत्रित रूप से करंट बहने देता है।
- इसका उपयोग वोल्टेज रेगुलेशन और सर्किट में स्थिर वोल्टेज प्रदान करने के लिए किया जाता है।
पीक इन्वर्स वोल्टेज और ब्रेकडाउन का महत्व
- सर्किट सुरक्षा: यदि PIV का ध्यान नहीं रखा गया, तो डायोड जल सकता है या सर्किट में क्षति हो सकती है।
- सही डायोड का चयन: एसी-डीसी कन्वर्टर, पावर सप्लाई, या वोल्टेज रेगुलेटर में, डायोड का PIV हमेशा सिग्नल वोल्टेज से अधिक होना चाहिए, ताकि सुरक्षित संचालन सुनिश्चित हो।
- ब्रेकडाउन का नियंत्रित उपयोग: Zener डायोड में ब्रेकडाउन को सकारात्मक रूप में उपयोग किया जाता है, जिससे सटीक वोल्टेज नियंत्रण संभव होता है।
नॉनलाइनियर व्यवहार और सिग्नल अनुप्रयोग
डायोड का करंट–वोल्टेज (I–V) संबंध नॉनलाइनियर होता है, अर्थात वोल्टेज बदलने पर करंट समान अनुपात में नहीं बदलता। कम फॉरवर्ड वोल्टेज पर डायोड लगभग धारा को रोकता है, लेकिन थ्रेशोल्ड वोल्टेज के बाद करंट अचानक बहुत तेज़ी से बढ़ता है। यह व्यवहार रैखिक न होकर घातीय होता है।
नॉनलाइनियर व्यवहार के कारण:
- वेवफॉर्म डिस्टॉर्शन होता है (सिग्नल का आकार बदल जाता है)
- मॉड्यूलेशन और डीमॉड्यूलेशन संभव होती है (रेडियो सिग्नल प्रोसेसिंग)
- हार्मोनिक्स उत्पन्न होते हैं (2f, 3f आदि फ्रीक्वेंसी)
- सिग्नल मिक्सिंग की जा सकती है (f1 ± f2 फ्रीक्वेंसी प्राप्त होती हैं)
कुछ विशेष डायोड, जैसे टनल डायोड, में नेगेटिव रेजिस्टेंस पाया जाता है, जहाँ वोल्टेज बढ़ाने पर करंट घटता है। इसका उपयोग RF और माइक्रोवेव सर्किट, ऑस्सीलेटर और हाई-स्पीड सर्किट में किया जाता है।
फॉरवर्ड और रिवर्स बायस का संक्षिप्त अंतर
| विशेषता | फॉरवर्ड बायस | रिवर्स बायस |
|---|---|---|
| कनेक्शन | P → +, N → – | P → –, N → + |
| डिप्लीशन लेयर | पतली | चौड़ी |
| करंट | बहता है | हीं बहता |
| प्रतिरोध | कम | बहुत अधिक |
| उपयोग | रेक्टिफिकेशन | ब्लॉकिंग / प्रोटेक्शन |
डायोड एक दिशा में ही करंट क्यों बहने देता है?
डायोड एक दिशा में ही करंट इसलिए बहने देता है क्योंकि उसके अंदर बना PN जंक्शन स्वाभाविक रूप से एक नियंत्रण अवरोध उत्पन्न करता है। इस जंक्शन पर बनने वाली डिप्लीशन लेयर एक विद्युत अवरोध (Potential Barrier) की तरह कार्य करती है, जो सामान्य स्थिति में चार्ज कैरियर्स के प्रवाह को रोकती है।
जब डायोड को फॉरवर्ड बायस में जोड़ा जाता है, तब बाहरी वोल्टेज इस अवरोध को कम कर देता है, जिससे इलेक्ट्रॉन और होल्स जंक्शन को आसानी से पार कर लेते हैं और करंट बहने लगता है। इसके विपरीत, रिवर्स बायस में यही डिप्लीशन लेयर और चौड़ी हो जाती है, जिससे अवरोध बढ़ जाता है और चार्ज कैरियर्स का प्रवाह लगभग पूरी तरह रुक जाता है।
इसी नियंत्रित अवरोध के कारण डायोड करंट को केवल एक दिशा में जाने देता है और दूसरी दिशा में रोक देता है, जो उसे रेक्टिफिकेशन और प्रोटेक्शन जैसे कार्यों के लिए अत्यंत उपयोगी बनाता है।
डायोड के मुख्य कार्य (Functions of Diode)
डायोड एक बहुउपयोगी अर्धचालक युक्ति है, जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक सर्किटों में विभिन्न महत्वपूर्ण कार्यों के लिए किया जाता है। इसकी मूल विशेषता—एक दिशा में करंट प्रवाहित करना—ही इसके अधिकांश अनुप्रयोगों का आधार है। नीचे डायोड के प्रमुख कार्यों को सरल और स्पष्ट रूप में समझाया गया है।
रेक्टिफिकेशन (AC से DC में परिवर्तन)
डायोड का सबसे सामान्य और महत्वपूर्ण कार्य रेक्टिफिकेशन है, जिसमें वह प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में परिवर्तित करता है। AC सप्लाई में करंट की दिशा लगातार बदलती रहती है, लेकिन डायोड केवल एक दिशा में करंट को गुजरने देता है। हाफ वेव रेक्टिफायर में डायोड AC सिग्नल के केवल एक अर्ध-चक्र को पास करता है,
जबकि फुल वेव रेक्टिफायर में दोनों अर्ध-चक्रों का उपयोग करके अधिक स्मूथ DC आउटपुट प्राप्त किया जाता है। पावर सप्लाई सर्किटों में यही प्रक्रिया सबसे अधिक उपयोग की जाती है।
वोल्टेज विनियमन (Voltage Regulation)
डायोड का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य वोल्टेज को स्थिर बनाए रखना है। इस उद्देश्य के लिए ज़ेनर डायोड का उपयोग किया जाता है। ज़ेनर डायोड रिवर्स बायस में एक निश्चित वोल्टेज पर ब्रेकडाउन करता है और उसी वोल्टेज को स्थिर बनाए रखता है। इससे सर्किट को ओवर-वोल्टेज से सुरक्षा मिलती है और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक घटकों को सुरक्षित, स्थिर सप्लाई वोल्टेज प्राप्त होता है।
सिग्नल डिमॉड्यूलेशन (Signal Demodulation)
डायोड का उपयोग रेडियो और संचार प्रणालियों में भी किया जाता है। विशेष रूप से AM (Amplitude Modulation) सिग्नलों में, डायोड डिटेक्टर की तरह काम करता है और कैरियर वेव से ऑडियो सिग्नल को अलग करता है। इस प्रक्रिया को डिमॉड्यूलेशन कहते हैं। इसी सिद्धांत के कारण रेडियो रिसीवर में प्रसारित आवाज़ को सुना जा सकता है।
सुरक्षा (Protection)
डायोड का उपयोग सर्किट की सुरक्षा के लिए भी व्यापक रूप से किया जाता है। रिवर्स पोलैरिटी प्रोटेक्शन में डायोड गलत तरीके से जुड़े पावर सप्लाई से सर्किट को नुकसान से बचाता है। इसके अलावा, ट्रांज़िएंट या वोल्टेज स्पाइक की स्थिति में विशेष डायोड अतिरिक्त वोल्टेज को बायपास कर देते हैं, जिससे महंगे और संवेदनशील कंपोनेंट सुरक्षित रहते हैं।
डायोड के प्रकार (Types of Diode in Hindi)
डायोड विभिन्न संरचनाओं और विशेष गुणों के कारण अलग-अलग कार्यों के लिए बनाए जाते हैं। प्रत्येक प्रकार का डायोड किसी विशेष इलेक्ट्रॉनिक समस्या का समाधान करता है—जैसे करंट नियंत्रण, वोल्टेज स्थिरीकरण, सिग्नल प्रोसेसिंग या सुरक्षा। नीचे सबसे महत्वपूर्ण 12 प्रकारों की व्याख्या दी गई है।
1. PN जंक्शन डायोड (PN junction diode)
PN जंक्शन डायोड सबसे सामान्य और मूलभूत प्रकार का डायोड है, जो P-टाइप और N-टाइप अर्धचालक को जोड़कर बनाया जाता है। इसमें बना PN जंक्शन डायोड को केवल एक दिशा में करंट प्रवाहित करने की क्षमता देता है। फॉरवर्ड बायस में यह आसानी से कंडक्ट करता है, जबकि रिवर्स बायस में करंट को रोक देता है। सिलिकॉन PN जंक्शन डायोड में सामान्यतः लगभग 0.7 V का फॉरवर्ड वोल्टेज ड्रॉप होता है।
इसका प्रमुख उपयोग रेक्टिफिकेशन में किया जाता है, जहाँ AC वोल्टेज को DC में बदला जाता है। इसी कारण यह पावर सप्लाई, चार्जर, एडैप्टर तथा सिग्नल क्लिपिंग और क्लैम्पिंग सर्किटों में व्यापक रूप से प्रयोग होता है।
2. ज़ेनर डायोड (Zener diode)
ज़ेनर डायोड को विशेष रूप से रिवर्स बायस में कार्य करने के लिए डिजाइन किया जाता है। यह एक निश्चित और पूर्वनिर्धारित वोल्टेज, जिसे ज़ेनर वोल्टेज कहते हैं, पर नियंत्रित ब्रेकडाउन करता है और उस वोल्टेज को स्थिर बनाए रखता है। ब्रेकडाउन के बाद भी ज़ेनर डायोड सुरक्षित रूप से काम करता है, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इस गुण के कारण ज़ेनर डायोड का उपयोग वोल्टेज रेगुलेटर, रेफरेंस वोल्टेज स्रोत और ओवर-वोल्टेज प्रोटेक्शन में किया जाता है। संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और IC को अधिक वोल्टेज से बचाने में इसका बहुत महत्व है।
3. शॉटकी डायोड (schottky diode)
शॉटकी डायोड एक विशेष प्रकार का डायोड है, जिसमें पारंपरिक PN जंक्शन के स्थान पर मेटल-सेमीकंडक्टर जंक्शन होता है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसका बहुत कम फॉरवर्ड वोल्टेज ड्रॉप होता है, जो सामान्यतः 0.2 से 0.4 वोल्ट के बीच रहता है। इसके कारण इसमें पावर लॉस कम होता है और स्विचिंग स्पीड बहुत अधिक होती है। यही वजह है कि शॉटकी डायोड का उपयोग SMPS, हाई-स्पीड डिजिटल सर्किट, RF सर्किट और फास्ट रेक्टिफिकेशन अनुप्रयोगों में किया जाता है, जहाँ दक्षता और गति अत्यंत आवश्यक होती है।
4. LED (Light Emitting Diode)
LED (Light Emitting Diode) ऐसा डायोड है जो फॉरवर्ड बायस में करंट प्रवाहित होने पर प्रकाश उत्सर्जित करता है। इसमें विद्युत ऊर्जा सीधे प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित होती है, जिससे इसकी ऊर्जा खपत बहुत कम होती है। LED की आयु लंबी होती है और यह पारंपरिक बल्बों की तुलना में अधिक विश्वसनीय और पर्यावरण-अनुकूल होती है। विभिन्न अर्धचालक सामग्री के उपयोग से LED अलग-अलग रंगों में उपलब्ध होती है। इसी कारण इसका उपयोग लाइटिंग सिस्टम, डिजिटल डिस्प्ले, इंडिकेटर लाइट, ट्रैफिक सिग्नल और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में व्यापक रूप से किया जाता है।
5. लेज़र डायोड (Laser diode)
लेज़र डायोड एक विशेष प्रकार का LED होता है, जो सामान्य LED की तुलना में अत्यंत तीव्र, संकीर्ण और सुसंगत (Coherent) प्रकाश उत्पन्न करता है। इसमें प्रकाश का उत्सर्जन उत्तेजित उत्सर्जन (Stimulated Emission) के सिद्धांत पर आधारित होता है, जिससे प्रकाश एक ही दिशा और एक ही फेज़ में निकलता है। इसी कारण लेज़र डायोड से प्राप्त बीम बहुत अधिक केंद्रित और सटीक होती है।
इसका व्यापक उपयोग फाइबर ऑप्टिक कम्युनिकेशन, CD/DVD ड्राइव, लेज़र प्रिंटर, बारकोड स्कैनर तथा विभिन्न मेडिकल और इंडस्ट्रियल उपकरणों में किया जाता है, जहाँ उच्च सटीकता और फोकस्ड लाइट की आवश्यकता होती है।
6. फोटोडायोड (Photodiode)
फोटोडायोड ऐसा डायोड है जो प्रकाश ऊर्जा को विद्युत धारा में परिवर्तित करता है। इसे सामान्यतः रिवर्स बायस में संचालित किया जाता है। जब इस पर प्रकाश पड़ता है, तो जंक्शन पर इलेक्ट्रॉन–होल जोड़े उत्पन्न होते हैं, जिससे करंट बढ़ जाता है। उत्पन्न करंट की मात्रा प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करती है। इसी गुण के कारण फोटोडायोड का उपयोग लाइट सेंसर, ऑप्टिकल कम्युनिकेशन रिसीवर, कैमरा सिस्टम, ऑटोमैटिक लाइट कंट्रोल और सुरक्षा अलार्म सर्किटों में किया जाता है। सोलर सेल भी फोटोडायोड के सिद्धांत पर ही कार्य करता है।
7. PIN डायोड (PIN Diode)
PIN डायोड एक विशेष संरचना वाला डायोड है, जिसमें P और N क्षेत्र के बीच एक इंस्ट्रिंसिक (I) लेयर होती है। यह I लेयर डायोड की डिप्लीशन रीजन को चौड़ा कर देती है, जिससे इसकी कैपेसिटेंस कम और हाई-फ्रीक्वेंसी पर प्रदर्शन बेहतर हो जाता है। इसी कारण PIN डायोड उच्च आवृत्ति, जैसे RF और माइक्रोवेव अनुप्रयोगों, के लिए अत्यंत उपयुक्त होता है। इसका उपयोग RF स्विच, एटेनुएटर, फेज़ शिफ्टर और मॉड्यूलेटर सर्किटों में व्यापक रूप से किया जाता है, विशेषकर संचार प्रणालियों में।
8. TVS (Transient Voltage Suppression) डायोड
TVS (Transient Voltage Suppression) डायोड का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक सर्किटों को अचानक आने वाले उच्च वोल्टेज सर्ज और ट्रांज़िएंट से बचाने के लिए किया जाता है। सामान्य अवस्था में यह निष्क्रिय रहता है, लेकिन जैसे ही वोल्टेज एक सुरक्षित सीमा से ऊपर जाता है, यह तुरंत कंडक्ट करके अतिरिक्त वोल्टेज को क्लैंप कर देता है। इस तेज़ प्रतिक्रिया के कारण संवेदनशील IC और इलेक्ट्रॉनिक घटक सुरक्षित रहते हैं।
TVS डायोड का उपयोग ESD प्रोटेक्शन, पावर लाइन सुरक्षा, डेटा लाइन और ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
9. वैरेक्टर डायोड (Varactor Diode)
वैरेक्टर डायोड (Varactor Diode) एक विशेष प्रकार का डायोड है, जिसकी मुख्य विशेषता यह है कि रिवर्स बायस वोल्टेज बदलने पर इसकी जंक्शन कैपेसिटेंस बदलती है। यह गुण इसे इलेक्ट्रॉनिक ट्यूनिंग सर्किटों में अत्यंत उपयोगी बनाता है। वैरेक्टर डायोड का प्रयोग विशेष रूप से FM रेडियो, ऑटोमैटिक फेज़-लॉक्ड लूप (PLL) और ऑस्सीलेटर सर्किटों में किया जाता है, जहाँ सर्किट की आवृत्ति को नियंत्रित करना आवश्यक होता है।
इसके माध्यम से बिना किसी मेकैनिकल बदलाव के सिग्नल की फ्रीक्वेंसी को इलेक्ट्रॉनिक रूप से ट्यून किया जा सकता है, जिससे यह आधुनिक संचार और RF अनुप्रयोगों में अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
10. टनल डायोड (Tunnel Diode)
टनल डायोड (Tunnel Diode) एक उच्च डोपिंग वाला डायोड है, जिसमें नेगेटिव रेज़िस्टेंस पाया जाता है। इसके कारण यह बहुत तेज़ गति से स्विच कर सकता है और पारंपरिक डायोड की तुलना में उच्च-फ्रीक्वेंसी सर्किटों में अधिक प्रभावी होता है। टनल डायोड का उपयोग मुख्यतः माइक्रोवेव ऑस्सीलेटर, RF एम्प्लीफायर और हाई-स्पीड डिजिटल सर्किट में किया जाता है। इसका नेगेटिव रेज़िस्टेंस क्षेत्र इसे उच्च गति और छोटे सिग्नल अनुप्रयोगों के लिए आदर्श बनाता है।
11. एवलांच डायोड (Avalanche Diode)
एवलांच डायोड (Avalanche Diode) नियंत्रित एवलांच ब्रेकडाउन पर कार्य करता है और उच्च वोल्टेज सहन करने में सक्षम होता है। यह डायोड अचानक आने वाले वोल्टेज सर्ज से सर्किट की सुरक्षा करता है और सर्ज प्रोटेक्शन सर्किटों में प्रमुख रूप से प्रयोग होता है। इसके अलावा, एवलांच डायोड हाई-वोल्टेज रेफरेंस सर्किटों और करंट रेगुलेटर डायोड के रूप में भी उपयोग किया जाता है, क्योंकि यह ब्रेकडाउन के दौरान स्थिर वोल्टेज बनाए रख सकता है।
इस प्रकार, यह संवेदनशील और उच्च वोल्टेज वाले इलेक्ट्रॉनिक सर्किटों की सुरक्षा और स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण डायोड है।
12. करंट रेगुलेटर डायोड (Current Regulator Diode)
करंट रेगुलेटर डायोड (Current Regulator Diode) एक विशेष प्रकार का डायोड है जो फॉरवर्ड बायस में एक निश्चित करंट को निरंतर बनाए रखता है, भले ही उसके ऊपर का वोल्टेज बदल रहा हो। इसे सतत करंट स्रोत (Constant Current Source) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इस डायोड की मुख्य विशेषता यह है कि यह छोटे और स्थिर करंट को नियंत्रित तरीके से प्रदान करता है, जिससे संवेदनशील सर्किटों में करंट फ्लक्चुएशन से बचाव होता है।
इसका उपयोग LED ड्राइविंग सर्किट, बैटरी चार्जर, ट्रांज़िस्टर बायसिंग सर्किट और विभिन्न एनालॉग सर्किटों में किया जाता है। करंट रेगुलेटर डायोड के कारण सर्किट की विश्वसनीयता बढ़ती है और घटकों को ओवरकरंट से होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखा जा सकता है।
डायोड के उपयोग (Applications of Diode)
डायोड इलेक्ट्रॉनिक्स का एक आसान और महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे समझना जरूरी है क्योंकि यह बहुत सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में काम आता है। डायोड सिर्फ बड़े सर्किट में नहीं, बल्कि हमारे रोजमर्रा के कई उपकरणों में मौजूद होता है। आइए जानते हैं डायोड के कुछ आसान और आम इस्तेमाल।
उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स
- स्मार्टफोन: डायोड संवेदनशील घटकों को वोल्टेज स्पाइक्स और रिवर्स करंट से सुरक्षित रखते हैं।
- टेलीविजन: LED डायोड ऊर्जा-कुशल और स्पष्ट डिस्प्ले प्रदान करते हैं।
- रेडियो: डायोड प्राप्त AM/FM संकेतों को डिमॉड्यूलेट करके श्रव्य ध्वनि में बदलते हैं।
- पावर सप्लाई यूनिट्स: डायोड AC को DC में बदलकर घरेलू उपकरणों को स्थिर वोल्टेज प्रदान करते हैं।
ऑटोमोटिव
- अल्टरनेटर: डायोड उत्पन्न AC करंट को DC में परिवर्तित करता है, जिससे वाहन की बैटरी चार्ज होती है।
- LED हेडलाइट्स और टेललाइट्स: डायोड इनके संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो चमक और ऊर्जा दक्षता सुनिश्चित करते हैं।
- रिवर्स करंट रोकना: डायोड बैटरी से गलत दिशा में करंट के प्रवाह को रोकते हैं, जिससे ऊर्जा बर्बाद नहीं होती।
सौर पैनल्स (Solar Panels)
- बैटरी सुरक्षा: रात के समय बिजली के विपरीत प्रवाह को रोककर बैटरी में संग्रहित ऊर्जा सुरक्षित रहती है।
- रेक्टिफिकेशन: पैनलों द्वारा उत्पन्न AC या अस्थिर DC करंट को स्थिर DC में बदलकर घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त बनाते हैं।
कम्प्यूटिंग और डेटा प्रोसेसिंग
- मेमोरी स्टोरेज: डायोड डेटा की अखंडता और स्थिरता सुनिश्चित करते हैं।
- प्रोसेसिंग यूनिट: डायोड ट्रांजिस्टर के साथ मिलकर तार्किक संचालन और गणनाओं में सहायता करते हैं।
- डेटा प्रोटेक्शन: ESD प्रोटेक्शन और सर्ज से महत्वपूर्ण कंप्यूटर घटकों को सुरक्षित रखते हैं।
चिकित्सा उपकरण
- एक्स-रे मशीनें: डायोड उच्च-वोल्टेज धाराओं को नियंत्रित कर स्पष्ट और सुरक्षित छवियां बनाने में मदद करते हैं।
- लेज़र डायोड: त्वचा के उपचार, आंखों की सर्जरी और अन्य चिकित्सा प्रक्रियाओं में सटीक प्रकाश प्रदान करते हैं, जिससे न्यूनतम चीर-फाड़ होती है।
उद्योग और औद्योगिक उपकरण
- इंडस्ट्रियल कंट्रोल सर्किट: डायोड स्विचिंग और रेक्टिफिकेशन के लिए उपयोग होते हैं, जैसे मोटर ड्राइव, पंप और औद्योगिक रोबोटिक्स में। यह उपकरणों की सुरक्षा और संचालन दक्षता सुनिश्चित करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
1. डायोड और ट्रांजिस्टर में क्या अंतर है?
डायोड दो टर्मिनल वाला अर्धचालक उपकरण है जो करंट को केवल एक दिशा में बहने देता है और इसका उपयोग रेक्टिफिकेशन, वोल्टेज रेगुलेशन और सिग्नल डिमॉड्यूलेशन में होता है। ट्रांजिस्टर तीन टर्मिनल वाला उपकरण है जो करंट और वोल्टेज को नियंत्रित करके सिग्नल को बढ़ाने (एम्पलीफिकेशन) या स्विचिंग के लिए प्रयोग किया जाता है। सरल शब्दों में, डायोड करंट की दिशा नियंत्रित करता है, जबकि ट्रांजिस्टर करंट बढ़ाने और स्विच करने का काम करता है।
2. LED और सामान्य डायोड में क्या अंतर है?
सामान्य डायोड करंट को केवल एक दिशा में बहने देता है और रेक्टिफिकेशन या सिग्नल प्रोसेसिंग में उपयोग होता है। LED करंट बहने पर प्रकाश उत्सर्जित करता है और इसका उपयोग लाइटिंग, डिस्प्ले और इंडिकेटर में होता है। सरल शब्दों में, सामान्य डायोड करंट नियंत्रित करता है, जबकि LED करंट से प्रकाश उत्पन्न करता है।
3. डायोड का फॉरवर्ड वोल्टेज ड्रॉप क्यों होता है?
डायोड का फॉरवर्ड वोल्टेज ड्रॉप इसलिए होता है क्योंकि जब इसे फॉरवर्ड बायस में जोड़ा जाता है, तो P-टाइप और N-टाइप क्षेत्रों के बीच बनी डिप्लीशन लेयर को पार करने के लिए चार्ज कैरियर्स (इलेक्ट्रॉन और होल्स) को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस ऊर्जा की वजह से डायोड के दो टर्मिनल के बीच एक निश्चित वोल्टेज गिरावट होती है, जिसे फॉरवर्ड वोल्टेज ड्रॉप कहा जाता है। उदाहरण के लिए, सिलिकॉन डायोड में यह लगभग 0.6–0.7 V और जर्मेनियम डायोड में लगभग 0.3 V होता है। सरल शब्दों में, यह वोल्टेज ड्रॉप डायोड के जंक्शन को सक्रिय करने और करंट प्रवाहित करने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा को दर्शाता है।
4. डायोड का रिवर्स ब्रेकडाउन क्या होता है?
डायोड का रिवर्स ब्रेकडाउन वह स्थिति है जब रिवर्स बायस वोल्टेज पीक इन्वर्स वोल्टेज (PIV) से अधिक हो जाता है। इस स्थिति में डिप्लीशन लेयर टूट जाती है और डायोड में अचानक बहुत अधिक करंट बहने लगता है। अगर इसे नियंत्रित न किया जाए तो डायोड और सर्किट को नुकसान पहुँच सकता है।
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