आज की आधुनिक दुनिया में बिजली (Electricity) के बिना जीवन की कल्पना करना लगभग असंभव है। हमारे घरों की रोशनी, फैक्ट्रियों की मशीनें, स्कूलों के उपकरण और अस्पतालों की जीवनरक्षक प्रणालियाँ—सभी निरंतर और सुरक्षित विद्युत आपूर्ति पर निर्भर करती हैं। इस पूरी विद्युत व्यवस्था में Transformer (ट्रांसफॉर्मर) एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि वही बिजली को उपयोग योग्य रूप में हम तक पहुँचाने में सहायक होता है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो Transformer Kya Hai—यह एक ऐसा electrical device है जो आवश्यकता के अनुसार विद्युत वोल्टेज को बढ़ाने या घटाने का कार्य करता है, बिना ऊर्जा की आवृत्ति बदले। बिजली के उत्पादन से लेकर वितरण तक, हर चरण में ट्रांसफॉर्मर की भूमिका अनिवार्य होती है।
इस लेख में हम Transformer Kya Hai से संबंधित प्रत्येक महत्वपूर्ण पहलू को बहुत आसान और समझने योग्य भाषा में विस्तार से समझेंगे, ताकि कोई भी पाठक इसके मूल सिद्धांत और महत्व को सहजता से समझ सके।
Table of Contents
Transformer Kya Hai? (ट्रांसफॉर्मर क्या है)
Transformer (ट्रांसफॉर्मर) एक static electrical device है, जिसका उपयोग प्रत्यावर्ती धारा (AC) के वोल्टेज स्तर को आवश्यकता अनुसार बढ़ाने (Step-up) या घटाने (Step-down) के लिए किया जाता है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह वोल्टेज को बदले बिना बिजली की frequency को बदले बिना कार्य करता है। यही कारण है कि ट्रांसफॉर्मर आधुनिक विद्युत प्रणालियों का एक अनिवार्य भाग है।
सरल शब्दों में: Transformer वह उपकरण है जो बिजली के वोल्टेज लेवल को बदलकर उसे सुरक्षित, प्रभावी और उपयोग योग्य बनाता है।
ट्रांसफॉर्मर विद्युत-चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत पर कार्य करता है। इसमें सामान्यतः दो या अधिक तार की कुंडलियाँ (Windings) होती हैं—
- Primary Winding
- Secondary Winding
ये दोनों कुंडलियाँ एक साझा चुंबकीय कोर (Magnetic Core) से जुड़ी होती हैं। जब प्राथमिक कुंडली में AC धारा प्रवाहित होती है, तो कोर में बदलता हुआ चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न होता है, जो द्वितीयक कुंडली में वोल्टेज प्रेरित करता है। कुंडलियों में घुमावों (Turns) की संख्या बदलकर ही वोल्टेज को बढ़ाया या घटाया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय विद्युत प्रौद्योगिकी आयोग (IEC) के अनुसार, ट्रांसफॉर्मर एक ऐसा स्थिर उपकरण है जिसमें दो या दो से अधिक वाइंडिंग होती हैं और जो विद्युत-चुंबकीय प्रेरण द्वारा एक AC वोल्टेज व करंट प्रणाली को दूसरी प्रणाली में परिवर्तित करता है।
ट्रांसफॉर्मर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है: यह बिजली उत्पादन केंद्रों पर वोल्टेज को बहुत अधिक स्तर तक बढ़ाता है, ताकि लंबी दूरी तक संचरण में ऊर्जा हानि कम हो घरों, उद्योगों और व्यावसायिक संस्थानों में उपयोग के लिए वोल्टेज को सुरक्षित स्तर तक कम करता है
Transformer Ka Working Principle (ट्रांसफॉर्मर का कार्य करने का सिद्धांत)
Transformer का working principle विद्युत-चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction), विशेष रूप से म्युचुअल इंडक्शन (Mutual Induction) पर आधारित होता है। यह सिद्धांत सबसे पहले माइकल फैराडे द्वारा प्रतिपादित किया गया था, और यही ट्रांसफार्मर के कार्य करने की वैज्ञानिक नींव है।

मूल सिद्धांत (Basic Concept)
जब प्राथमिक कुंडली (Primary Coil) में प्रत्यावर्ती धारा (AC) प्रवाहित की जाती है, तो उसके चारों ओर एक समय के साथ बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। यह चुंबकीय क्षेत्र ट्रांसफार्मर के लोहे के कोर (Magnetic Core) के माध्यम से प्रवाहित होकर द्वितीयक कुंडली (Secondary Coil) को काटता है।
फैराडे के विद्युत-चुंबकीय प्रेरण के नियम के अनुसार: किसी कुंडली से जुड़े चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होने पर उसमें विद्युत वाहक बल (EMF) प्रेरित होता है।
इसी नियम के कारण द्वितीयक कुंडली में वोल्टेज उत्पन्न (Induce) हो जाता है और यदि परिपथ बंद हो, तो उसमें धारा भी प्रवाहित होने लगती है।
ट्रांसफॉर्मर की कार्य प्रक्रिया (Step-by-Step Transformer Working)
ट्रांसफॉर्मर के प्राइमरी कॉइल में AC सप्लाई दी जाती है, जिससे उसमें बहने वाली प्रत्यावर्ती धारा कोर में परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स (Alternating Magnetic Flux) उत्पन्न करती है। यह चुंबकीय फ्लक्स कोर के माध्यम से प्रवाहित होकर सेकेंडरी कॉइल को काटता है। फ्लक्स के निरंतर परिवर्तन के कारण फैराडे के विद्युतचुंबकीय प्रेरण के नियम के अनुसार सेकेंडरी कॉइल में EMF (वोल्टेज) प्रेरित हो जाता है। प्राइमरी और सेकेंडरी कॉइल में मौजूद घुमावों (Turns) की संख्या के अनुपात पर निर्भर करता है कि ट्रांसफॉर्मर वोल्टेज को Step-up या Step-down करेगा।
वोल्टेज का संबंध (Voltage–Turns Relationship): एक आदर्श ट्रांसफार्मर (Ideal Transformer) में वोल्टेज का अनुपात कुंडलियों के टर्न्स के अनुपात के बराबर होता है:
Vp / Vs = Np / Ns
जहाँ—
- 𝑉𝑝 = प्राथमिक वोल्टेज
- 𝑉𝑠 = द्वितीयक वोल्टेज
- 𝑁𝑝 = प्राथमिक कुंडली के टर्न
- 𝑁𝑠 = द्वितीयक कुंडली के टर्न
ट्रांसफार्मर केवल AC पर क्यों काम करता है?
ट्रांसफार्मर के कार्य करने के लिए बदलता हुआ चुंबकीय फ्लक्स आवश्यक होता है। जब प्राइमरी कुंडली में AC धारा प्रवाहित की जाती है, तो वह समय के साथ बदलती रहती है, जिसके कारण कोर में परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है और यही फ्लक्स सेकेंडरी कुंडली में वोल्टेज प्रेरित करता है। इसके विपरीत, DC धारा स्थिर होती है, जिससे चुंबकीय फ्लक्स में कोई परिवर्तन नहीं होता और परिणामस्वरूप द्वितीयक कुंडली में EMF प्रेरित नहीं हो पाता। इसी वैज्ञानिक कारण से ट्रांसफार्मर DC पर कार्य नहीं करता।
और पढ़ें: ट्रांसफॉर्मर में (OTI और WTI) क्या होता है?
Transformer Ke Main Parts (ट्रांसफार्मर के मुख्य भाग)
ट्रांसफार्मर का निर्माण इस तरह किया जाता है कि वह विद्युत ऊर्जा को सुरक्षित, कुशल और विश्वसनीय तरीके से स्थानांतरित कर सके। इसके हर भाग की अपनी एक स्पष्ट भूमिका होती है। नीचे ट्रांसफार्मर के मुख्य भागों को सरल और तकनीकी समझ के साथ समझाया गया है।

1. Core (कोर)
कोर (Core) को ट्रांसफार्मर की चुंबकीय रीढ़ (Magnetic Backbone) कहा जाता है। यह सामान्यतः लैमिनेटेड सिलिकॉन स्टील शीट्स से बना होता है, जिससे ऊर्जा हानियाँ कम की जा सकें। कोर का मुख्य कार्य चुंबकीय फ्लक्स के प्रवाह के लिए कम रिलक्टेंस वाला मार्ग प्रदान करना और प्राइमरी तथा सेकेंडरी वाइंडिंग के बीच बेहतर मैग्नेटिक कपलिंग सुनिश्चित करना है। लैमिनेशन के कारण एडी करंट लॉस और हिस्टेरिसिस लॉस में उल्लेखनीय कमी आती है। सरल शब्दों में, कोर यह सुनिश्चित करता है कि चुंबकीय ऊर्जा न्यूनतम हानि के साथ एक वाइंडिंग से दूसरी वाइंडिंग तक पहुँचे।
2. Primary Winding
प्राइमरी वाइंडिंग (Primary Winding) वह कुंडली होती है जिसमें इनपुट AC वोल्टेज प्रदान किया जाता है। यह सामान्यतः इन्सुलेटेड तांबे (Copper) या एल्युमिनियम (Aluminium) के तार से बनी होती है। जब प्राइमरी वाइंडिंग में AC धारा प्रवाहित होती है, तो यह परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न करती है। यही फ्लक्स ट्रांसफार्मर की पूरी कार्यप्रणाली की शुरुआत करता है और सेकेंडरी वाइंडिंग में वोल्टेज प्रेरित होने का आधार बनता है।
3. सेकेंडरी वाइंडिंग (Secondary Winding)
सेकेंडरी वाइंडिंग (Secondary Winding) ट्रांसफार्मर का वह महत्वपूर्ण भाग होती है जहाँ से हमें आवश्यक आउटपुट वोल्टेज और शक्ति प्राप्त होती है। यह उच्च गुणवत्ता वाले इन्सुलेटेड चालक तार से बनी होती है, जिससे विद्युत हानि और गर्मी कम होती है। प्राइमरी वाइंडिंग में उत्पन्न परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स जब सेकेंडरी वाइंडिंग को काटता है, तब फैराडे के विद्युतचुंबकीय प्रेरण के नियम के अनुसार इसमें EMF (वोल्टेज) प्रेरित होता है।
सेकेंडरी वाइंडिंग में घुमावों की संख्या जितनी अधिक या कम होती है, उसी अनुपात में आउटपुट वोल्टेज Step-up या Step-down हो जाता है, जिससे ट्रांसफार्मर विभिन्न विद्युत उपकरणों की जरूरतों के अनुसार वोल्टेज प्रदान कर पाता है।
4. इन्सुलेशन सिस्टम (Insulation System)
इन्सुलेशन सिस्टम (Insulation System) ट्रांसफार्मर की दीर्घायु, सुरक्षा और विश्वसनीय संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। यह न केवल प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग को आपस में तथा कोर से विद्युत रूप से अलग रखता है, बल्कि ट्रांसफार्मर को शॉर्ट सर्किट, लीकेज करंट और हाई वोल्टेज ब्रेकडाउन से भी सुरक्षित करता है। इसके अतिरिक्त, इन्सुलेशन प्रणाली ट्रांसफार्मर के संचालन के दौरान उत्पन्न ताप को नियंत्रित करने और विद्युत एवं तापीय तनाव (Electrical & Thermal Stress) को सहन करने में सहायता करती है।
इसी कारण इसमें विशेष इन्सुलेटिंग पेपर, सूती कपड़ा, उन्नत सिंथेटिक सामग्री और ट्रांसफार्मर ऑयल का प्रयोग किया जाता है, जो शीतलन (Cooling) और सुरक्षा—दोनों कार्य प्रभावी रूप से करते हैं।
5. ट्रांसफार्मर ऑयल (Transformer Oil)
ट्रांसफार्मर ऑयल (Transformer Oil) विशेष रूप से पावर ट्रांसफार्मरों में प्रयुक्त किया जाता है और यह केवल एक तरल नहीं, बल्कि दोहरा सुरक्षा माध्यम होता है। यह वाइंडिंग और कोर के बीच प्रभावी इन्सुलेशन प्रदान करता है, जिससे हाई वोल्टेज पर भी विद्युत ब्रेकडाउन की संभावना कम हो जाती है। इसके साथ-साथ ट्रांसफार्मर में होने वाली कॉपर लॉस और आयरन लॉस से उत्पन्न ऊष्मा को सोखकर शीतलन (Cooling) का कार्य करता है, जिससे ट्रांसफार्मर का तापमान सुरक्षित सीमा में बना रहता है।
ट्रांसफार्मर ऑयल में उच्च परावैद्युत शक्ति (High Dielectric Strength), उच्च फ्लैश पॉइंट और अच्छी थर्मल कंडक्टिविटी होती है, जो इसे लंबे समय तक सुरक्षित और विश्वसनीय संचालन के लिए उपयुक्त बनाती है।
6. ट्रांसफार्मर टैंक (Tank)
टैंक (Tank) ट्रांसफार्मर के सभी आंतरिक घटकों को यांत्रिक मजबूती और संरचनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है। इसी टैंक के अंदर कोर, प्राइमरी व सेकेंडरी वाइंडिंग तथा ट्रांसफार्मर ऑयल भरे होते हैं। टैंक का मुख्य कार्य ट्रांसफार्मर को बाहरी वातावरण, नमी, धूल और यांत्रिक झटकों से सुरक्षित रखना होता है। सामान्यतः यह उच्च गुणवत्ता वाले स्टील से बनाया जाता है ताकि वह तेल का भार, आंतरिक दबाव और तापीय विस्तार को सहन कर सके। इसके अतिरिक्त, टैंक पर लगे रेडिएटर या कूलिंग फिन्स ट्रांसफार्मर की ऊष्मा अपसारण क्षमता को बढ़ाकर उसके कुशल और दीर्घकालिक संचालन में सहायता करते हैं।
7. ट्रांसफार्मर बुशिंग (Bushings)
बुशिंग (Bushings) ट्रांसफार्मर के ऐसे आवश्यक घटक होते हैं जो अंदर स्थित वाइंडिंग को बाहरी विद्युत सर्किट से सुरक्षित रूप से जोड़ने का कार्य करते हैं। ये हाई वोल्टेज और लो वोल्टेज टर्मिनलों को टैंक से विद्युत रूप से इन्सुलेट रखती हैं, जिससे लीकेज करंट और फ्लैशओवर का खतरा कम हो जाता है। बुशिंग सामान्यतः पोर्सिलेन या एपॉक्सी रेज़िन से बनी होती हैं, क्योंकि इन सामग्रियों में उच्च परावैद्युत शक्ति और यांत्रिक मजबूती होती है। सही डिज़ाइन की बुशिंग ट्रांसफार्मर की विश्वसनीयता, सुरक्षा और लंबी आयु सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
8. ट्रांसफार्मर के कूलिंग एवं सुरक्षा भाग (Cooling & Safety Parts)
कूलिंग एवं सुरक्षा भाग (Cooling & Safety Parts) पावर ट्रांसफार्मर के सुरक्षित, नियंत्रित और निरंतर संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। रेडिएटर या कूलिंग ट्यूब्स ट्रांसफार्मर ऑयल से ऊष्मा को बाहर निकालकर उसे ठंडा रखते हैं, जिससे ओवरहीटिंग से बचाव होता है। ट्रांसफार्मर कंज़र्वेटर टैंक तापमान परिवर्तन के कारण तेल के फैलने और सिकुड़ने की व्यवस्था करता है, जबकि ब्रीदर, जो सामान्यतः सिलिका जेल से भरा होता है, हवा से आने वाली नमी को रोककर तेल की गुणवत्ता बनाए रखता है।
ट्रांसफॉर्मर टैप चेंजर की सहायता से आउटपुट वोल्टेज को आवश्यकता अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे लोड में बदलाव के बावजूद स्थिर वोल्टेज मिलता है। वहीं बुखहोल्ज़ रिले (Buchholz Relay) ट्रांसफार्मर के अंदर होने वाले आंतरिक दोषों, जैसे गैस बनने या तेल के असामान्य प्रवाह, का समय रहते पता लगाकर ट्रांसफार्मर को गंभीर क्षति से बचाने में मदद करता है।
ट्रांसफार्मर में कोर चुंबकीय ऊर्जा के प्रवाह के लिए उपयुक्त मार्ग प्रदान करता है, वाइंडिंग विद्युत ऊर्जा को एक वोल्टेज स्तर से दूसरे वोल्टेज स्तर में परिवर्तित करती हैं, इन्सुलेशन और ट्रांसफार्मर ऑयल सुरक्षा के साथ-साथ प्रभावी शीतलन सुनिश्चित करते हैं।
transformer kitne prakar ke hote hain (ट्रांसफॉर्मर के प्रकार)
वास्तविक विद्युत प्रणालियों में हर जगह एक ही तरह का ट्रांसफॉर्मर काम नहीं करता। वोल्टेज स्तर, उपयोग का उद्देश्य, मापन, सुरक्षा और संरचना—इन सभी जरूरतों के अनुसार ट्रांसफॉर्मर को अलग-अलग प्रकारों में डिजाइन किया जाता है। नीचे ट्रांसफॉर्मर के प्रमुख प्रकारों को उदाहरणों के साथ समझाया गया है।

1. स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर (Step-Up Transformer)
स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर (Step-Up Transformer) वह ट्रांसफॉर्मर होता है जो इनपुट वोल्टेज को बढ़ाने का कार्य करता है। इसमें सेकेंडरी वाइंडिंग में प्राइमरी की तुलना में अधिक टर्न्स होते हैं, जिसके कारण आउटपुट वोल्टेज बढ़ जाता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से पावर स्टेशन में जनरेटर के पास किया जाता है, जहाँ उत्पन्न बिजली को लंबी दूरी तक भेजने से पहले उच्च वोल्टेज में बदला जाता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि उच्च वोल्टेज पर करंट कम हो जाता है, जिससे तारों में होने वाली I²R लाइन हानि काफी कम हो जाती है और ऊर्जा का संचरण अधिक दक्षता से होता है।
2. स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर (Step-Down Transformer)
स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर (Step-Down Transformer) उच्च वोल्टेज को कम और सुरक्षित वोल्टेज में बदलने का कार्य करता है। इसमें सेकेंडरी वाइंडिंग के टर्न्स प्राइमरी से कम होते हैं, जिससे आउटपुट वोल्टेज घट जाता है। ऐसे ट्रांसफॉर्मर का उपयोग घरों में 220V सप्लाई प्रदान करने तथा वायरलेस चार्जर, मोबाइल चार्जर, टीवी, रेफ्रिजरेटर और अन्य घरेलू उपकरणों में किया जाता है। यह उपभोक्ताओं को सुरक्षित और नियंत्रित वोल्टेज उपलब्ध कराता है, जिससे उपकरणों की सुरक्षा और कार्यक्षमता बनी रहती है।
3. पावर ट्रांसफॉर्मर (Power Transformer)
पावर ट्रांसफॉर्मर (Power Transformer) का उपयोग मुख्य रूप से उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन सिस्टम में किया जाता है। ये ट्रांसफॉर्मर बहुत अधिक क्षमता (High MVA rating) के होते हैं और सामान्यतः फुल लोड के आसपास कार्य करने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। पावर ट्रांसफॉर्मर में दक्षता (Efficiency) पर विशेष ध्यान दिया जाता है, क्योंकि ट्रांसमिशन स्तर पर होने वाली ऊर्जा हानि का प्रभाव पूरे पावर सिस्टम पर पड़ता है। इन्हें सामान्यतः जनरेटिंग स्टेशन और ट्रांसमिशन सब-स्टेशन में लगाया जाता है, जहाँ वोल्टेज को लंबी दूरी के संचरण के लिए बढ़ाया या उपयुक्त स्तर पर घटाया जाता है।
4. डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर (Distribution Transformer)
जो बिजली को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुँचाता है। यह सामान्यतः 11kV को 440V या 220V में परिवर्तित करता है। डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर को दिन-रात बदलते लोड पर लगातार काम करना होता है, इसलिए इसे विशेष रूप से कम नो-लोड लॉस के लिए डिज़ाइन किया जाता है। ये ट्रांसफॉर्मर आमतौर पर बिजली के खंभों पर या ग्राउंड-माउंटेड यूनिट के रूप में लगाए जाते हैं, ताकि घरों, दुकानों और छोटे उद्योगों को सुरक्षित और विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति मिल सके।
5. आइसोलेशन ट्रांसफॉर्मर (Isolation Transformer)
आइसोलेशन ट्रांसफॉर्मर (Isolation Transformer) ऐसा ट्रांसफॉर्मर होता है जिसमें इनपुट और आउटपुट वोल्टेज लगभग समान रहता है, लेकिन प्राइमरी और सेकेंडरी के बीच सीधा विद्युत संपर्क नहीं होता। इसका मुख्य उद्देश्य इलेक्ट्रिकल सेफ्टी प्रदान करना और नॉइज़ व इंटरफेरेंस को कम करना है, जिससे संवेदनशील उपकरण सुरक्षित रूप से कार्य कर सकें। यह ट्रांसफॉर्मर विशेष रूप से मेडिकल उपकरणों, लैबोरेटरी सेटअप और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में उपयोग किया जाता है, जहाँ मानव सुरक्षा और सिग्नल की शुद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
6. ऑटो ट्रांसफॉर्मर (Auto Transformer)
ऑटो ट्रांसफॉर्मर (Auto Transformer) में केवल एक ही वाइंडिंग होती है, जो प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों का कार्य करती है। इसी कारण इसका आकार छोटा, लागत कम और दक्षता (Efficiency) अधिक होती है, क्योंकि इसमें तांबे की मात्रा और हानियाँ कम होती हैं। हालांकि इसकी एक महत्वपूर्ण सीमा यह है कि यह इलेक्ट्रिकल आइसोलेशन प्रदान नहीं करता, जिससे सुरक्षा स्तर कम हो जाता है। ऑटो ट्रांसफॉर्मर का उपयोग सामान्यतः वोल्टेज रेगुलेटर, मोटर स्टार्टिंग और वैरिएक (Variac) जैसे अनुप्रयोगों में किया जाता है, जहाँ वोल्टेज को नियंत्रित करना आवश्यक होता है और पूर्ण आइसोलेशन की आवश्यकता नहीं होती।
7. करंट ट्रांसफॉर्मर (Current Transformer – CT)
करंट ट्रांसफॉर्मर (Current Transformer – CT) का उपयोग उच्च करंट को मापने के लिए किया जाता है। यह बड़े करंट को छोटे और सुरक्षित मान जैसे 5A या 1A में परिवर्तित कर देता है, जिससे मेज़रिंग इंस्ट्रूमेंट्स और प्रोटेक्शन रिले सुरक्षित रूप से कार्य कर सकें। CT का व्यापक उपयोग पावर सिस्टम में करंट मापन, ओवरकरंट प्रोटेक्शन और मॉनिटरिंग के लिए किया जाता है। एक अत्यंत महत्वपूर्ण सावधानी यह है कि CT की सेकेंडरी को कभी भी ओपन नहीं छोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने पर उसमें बहुत अधिक वोल्टेज उत्पन्न हो सकता है, जो उपकरणों और मानव सुरक्षा के लिए खतरनाक होता है।
8. पोटेंशियल ट्रांसफॉर्मर (Potential Transformer
पोटेंशियल ट्रांसफॉर्मर (Potential Transformer – PT या VT) का उपयोग उच्च वोल्टेज को मापने के लिए किया जाता है। यह उच्च वोल्टेज को घटाकर 110V या 63.5V जैसे कम और मानक वोल्टेज में बदल देता है, जिससे सटीक और सुरक्षित वोल्टेज मापन संभव हो पाता है। PT का प्रयोग मुख्य रूप से मीटरिंग सिस्टम और प्रोटेक्शन सिस्टम में किया जाता है, जहाँ वोल्टेज की सही जानकारी आवश्यक होती है। यह ट्रांसफॉर्मर पावर सिस्टम की सुरक्षा, नियंत्रण और निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
9. इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफॉर्मर (Instrument Transformer)
इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफॉर्मर (Instrument Transformer) में करंट ट्रांसफॉर्मर (CT) और पोटेंशियल ट्रांसफॉर्मर (PT) दोनों शामिल होते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य विद्युत मापन (Measurement) और पावर सिस्टम की सुरक्षा (Protection) सुनिश्चित करना होता है। इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफॉर्मर उच्च करंट और उच्च वोल्टेज को सुरक्षित, मानक और मापने योग्य मानों में बदलते हैं, जिससे मीटरिंग उपकरण और प्रोटेक्शन रिले सही एवं सुरक्षित रूप से कार्य कर सकें। ये ट्रांसफॉर्मर पावर सिस्टम की निगरानी, नियंत्रण और फॉल्ट डिटेक्शन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
10. फेज़ के आधार पर ट्रांसफॉर्मर
फेज़ के आधार पर ट्रांसफॉर्मर को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है
- सिंगल-फेज ट्रांसफॉर्मर: सिंगल-फेज ट्रांसफॉर्मर का उपयोग सामान्यतः घरेलू और छोटे लोड वाले अनुप्रयोगों में किया जाता है, जहाँ बिजली की मांग कम होती है।
- थ्री-फेज ट्रांसफॉर्मर: थ्री-फेज ट्रांसफॉर्मर का उपयोग औद्योगिक संयंत्रों, बड़े वाणिज्यिक लोड और ट्रांसमिशन सिस्टम में किया जाता है, क्योंकि यह अधिक शक्ति को कुशलता से संभाल सकता है और संतुलित विद्युत आपूर्ति प्रदान करता है।
11. निर्माण (Construction) के आधार पर ट्रांसफॉर्मर
- कोर टाइप ट्रांसफॉर्मर: कोर टाइप ट्रांसफॉर्मर में वाइंडिंग कोर को घेरे रहती है, जिससे शीतलन अच्छा होता है और उच्च वोल्टेज अनुप्रयोगों में इसका उपयोग अधिक होता है।
- शेल टाइप ट्रांसफॉर्मर: शेल टाइप ट्रांसफॉर्मर में कोर वाइंडिंग को चारों ओर से घेरे रहता है, जिससे बेहतर मैग्नेटिक कपलिंग और यांत्रिक मजबूती मिलती है, इसलिए यह कम वोल्टेज और उच्च करंट वाले अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त होता है।
- बेरी टाइप ट्रांसफॉर्मर: बेरी टाइप ट्रांसफॉर्मर एक विशेष डिज़ाइन होता है, जिसका उपयोग अत्यधिक उच्च क्षमता और विशेष औद्योगिक अनुप्रयोगों में किया जाता है, जहाँ उच्च दक्षता और मजबूत संरचना की आवश्यकता होती है।
12. कूलिंग (Cooling) के आधार पर ट्रांसफॉर्मर
- ऑयल कूल्ड ट्रांसफॉर्मर: ऑयल कूल्ड ट्रांसफॉर्मर में ट्रांसफार्मर ऑयल इन्सुलेशन और शीतलन दोनों का कार्य करता है, इसलिए इसका उपयोग सामान्यतः बड़े पावर ट्रांसफॉर्मरों और आउटडोर इंस्टॉलेशन में किया जाता है।
- ड्राई टाइप ट्रांसफॉर्मर: ड्राई टाइप ट्रांसफॉर्मर में तेल का उपयोग नहीं होता, जिससे आग लगने का खतरा कम रहता है। इस कारण इन्हें इंडोर स्थानों, अस्पतालों, मॉल और फायर-सेंसिटिव क्षेत्रों में प्राथमिकता दी जाती है।
और पढ़ें: ट्रांसफार्मर में PRV और OSR रिले क्या हैं?
Step-Up vs Step-Down Transformer (Difference)
विद्युत शक्ति प्रणाली में Step-Up और Step-Down ट्रांसफॉर्मर की भूमिकाएँ बिल्कुल अलग होती हैं। एक ओर जहाँ Step-Up Transformer बिजली को लंबी दूरी तक भेजने के लिए वोल्टेज बढ़ाता है, वहीं Step-Down Transformer उसी बिजली को उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षित स्तर तक घटाता है। नीचे दोनों के बीच अंतर को एक सरल तालिका (TABLE) में समझा गया है।
| विशेषता (Feature) | Step-Up Transformer | Step-Down Transformer |
|---|---|---|
| वोल्टेज (Voltage) | वोल्टेज बढ़ाता है | वोल्टेज घटाता है |
| टर्न्स (Turns) | Secondary winding के turns अधिक | Primary winding के turns अधिक |
| करंट (Current) | करंट कम हो जाता है | करंट बढ़ जाता है |
| उपयोग का स्थान | Power station के पास | Distribution लाइन के पास |
| मुख्य उपयोग | लंबी दूरी तक ट्रांसमिशन | घरों और दुकानों की सप्लाई |
| ऊर्जा हानि | कम करने में सहायक | सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करता है |
| उदाहरण | 11kV → 220kV | 11kV → 220V |
Step-Up Transformer बिजली को दूर तक कुशलता से पहुँचाने के लिए जरूरी है, जबकि Step-Down Transformer उसी बिजली को हमारे रोज़मर्रा के उपयोग के लिए सुरक्षित बनाता है। दोनों मिलकर पूरी पावर सिस्टम को संतुलित और प्रभावी बनाते हैं।
Transformer Losses (ट्रांसफॉर्मर में होने वाली हानियाँ)
ट्रांसफॉर्मर एक उच्च दक्षता वाला स्थिर विद्युत उपकरण है, फिर भी इसमें कुछ ऊर्जा हानियाँ होती हैं। ये हानियाँ मुख्य रूप से विद्युत ऊर्जा के ऊष्मा में बदल जाने के कारण उत्पन्न होती हैं, जिससे ट्रांसफॉर्मर की दक्षता और तापमान प्रभावित होता है। इन हानियों को स्थिर (Constant) और परिवर्तनशील (Variable) हानियों में वर्गीकृत किया जाता है।

1. Copper Loss (ताम्र हानि)
Copper Loss ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग में होती है। जब वाइंडिंग से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो तार के प्रतिरोध के कारण ऊष्मा उत्पन्न होती है। यह हानि धारा के वर्ग के समानुपाती होती है, इसलिए इसे I²R Loss कहा जाता है। चूँकि यह लोड पर निर्भर करती है, इसलिए इसे परिवर्तनशील हानि (Variable Loss) माना जाता है। अधिक लोड होने पर वाइंडिंग अधिक गर्म होती है, जिससे Copper Loss बढ़ जाती है।
2. Core Loss (कोर हानि / आयरन लॉस)
Core Loss ट्रांसफॉर्मर की चुंबकीय कोर में होती है और यह लोड पर निर्भर नहीं करती, इसलिए इसे स्थिर हानि (Constant Loss) कहा जाता है। यह हानि मुख्य रूप से AC सप्लाई के कारण उत्पन्न होती है, क्योंकि कोर में चुंबकीय फ्लक्स लगातार बदलता रहता है।
2.1 Hysteresis Loss (हिस्टैरेसिस हानि)
Hysteresis Loss कोर के चुंबकीय पदार्थ में होती है। जब AC के कारण चुंबकीय क्षेत्र बार-बार अपनी दिशा बदलता है, तो कोर को बार-बार मैग्नेटाइज और डी-मैग्नेटाइज होना पड़ता है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा नष्ट होकर ऊष्मा में बदल जाती है। यह हानि कोर की चुंबकीय सामग्री पर निर्भर करती है और Soft Magnetic Materials जैसे सिलिकॉन स्टील के उपयोग से इसे कम किया जाता है।
2.2 Eddy Current Loss (एडी करंट हानि)
Eddy Current Loss कोर में उत्पन्न प्रेरित धाराओं (Induced Currents) के कारण होती है। बदलते चुंबकीय फ्लक्स से कोर के भीतर छोटे-छोटे वृत्ताकार करंट उत्पन्न होते हैं, जो कोर को गर्म करते हैं। इस हानि को कम करने के लिए कोर को पतली-पतली लैमिनेटेड शीट्स से बनाया जाता है, जिससे करंट का प्रवाह बाधित हो जाता है।
3. Leakage Flux Loss (लीकेज फ्लक्स हानि)
Leakage Flux Loss तब होती है जब ट्रांसफॉर्मर का पूरा चुंबकीय फ्लक्स द्वितीयक वाइंडिंग से लिंक नहीं हो पाता और कुछ फ्लक्स बाहर फैल जाता है। यह बाहरी फ्लक्स आसपास की धातुओं में अनावश्यक धाराएँ उत्पन्न करता है, जिससे अतिरिक्त ऊष्मा और ऊर्जा हानि होती है। इसका प्रभाव वोल्टेज रेगुलेशन पर भी पड़ता है।
ट्रांसफॉर्मर में होने वाली हानियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकतीं, लेकिन बेहतर डिजाइन, उच्च गुणवत्ता की सामग्री, लैमिनेटेड कोर और कुशल कूलिंग सिस्टम के उपयोग से इन्हें काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही कारण है कि आधुनिक ट्रांसफॉर्मर अत्यधिक दक्ष होते हैं।
और पढ़ें: प्रत्यावर्ती धारा (AC) और प्रत्यक्ष धारा (DC) : परिभाषा, अंतर, उपयोग
Transformer Efficiency (ट्रांसफॉर्मर की दक्षता)
ट्रांसफॉर्मर को विद्युत इंजीनियरिंग का सबसे अधिक efficient electrical device माना जाता है। व्यावहारिक रूप से एक अच्छे ट्रांसफॉर्मर की दक्षता 95% से 99% तक होती है, जिसका अर्थ है कि इसमें इनपुट दी गई ऊर्जा का बहुत छोटा भाग ही हानियों (Losses) में नष्ट होता है और अधिकांश ऊर्जा उपयोगी आउटपुट के रूप में प्राप्त होती है।
ट्रांसफॉर्मर की उच्च दक्षता का कारण यह है कि इसमें कोई घूमने वाला भाग (Moving Part) नहीं होता और यांत्रिक हानियाँ लगभग नगण्य होती हैं। केवल ताम्र हानि (Copper Loss) और कोर हानि (Core Loss) ही मुख्य ऊर्जा हानियाँ होती हैं, जिन्हें आधुनिक डिज़ाइन और बेहतर सामग्री द्वारा काफी हद तक कम कर दिया जाता है।
Transformer Efficiency का सूत्र (Formula): ट्रांसफॉर्मर की दक्षता को इनपुट और आउटपुट पावर के अनुपात से व्यक्त किया जाता है:
Efficiency = (Output Power / Input Power) × 100
सरल शब्दों में समझें: यदि किसी ट्रांसफॉर्मर को 100 यूनिट विद्युत शक्ति दी जाए और उससे 98 यूनिट उपयोगी शक्ति प्राप्त हो, तो उसकी दक्षता 98% होगी। यही कारण है कि ट्रांसफॉर्मर को बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण प्रणाली में अत्यंत भरोसेमंद और ऊर्जा-संरक्षण वाला उपकरण माना जाता है।
ट्रांसफार्मर के अनुप्रयोग (Applications of Transformer)
ट्रांसफार्मर आज के विद्युत तंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। यह न केवल बिजली के सुरक्षित और कुशल वितरण में मदद करता है बल्कि औद्योगिक, वाणिज्यिक और घरेलू क्षेत्रों में भी इसका व्यापक उपयोग है। आइए इसके प्रमुख अनुप्रयोगों को सरल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझें।

1. विद्युत उत्पादन और पारेषण (Power Generation & Transmission)
पावर प्लांट में स्टेप-अप ट्रांसफार्मर का उपयोग जनरेटर से आने वाले वोल्टेज को उच्च वोल्टेज में बदलने के लिए किया जाता है (≈20 kV → 230–765 kV)। इससे लंबी दूरी पर बिजली भेजने में I²R Loss हानियाँ कम होती हैं। सबस्टेशन ट्रांसफार्मर ग्रिड के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने या वितरण नेटवर्क को बिजली देने के लिए वोल्टेज स्तर को समायोजित करते हैं।
2. वितरण प्रणालियाँ (Distribution Systems)
पोल-माउंटेड और पैड-माउंटेड वितरण ट्रांसफार्मर मध्यम वोल्टेज (12–35 kV) को सुरक्षित सेवा वोल्टेज में बदलते हैं, जैसे कि घरेलू उपयोग के लिए 120/240 V और वाणिज्यिक/औद्योगिक भार के लिए 480 V। ये सिंगल-फेज या थ्री-फेज हो सकते हैं और ONAN/ONAF कूलिंग द्वारा ठंडा किए जाते हैं।
3. माप और सुरक्षा (Measurement & Protection)
इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफार्मर जैसे कि CT (Current Transformer) और PT (Potential Transformer) उच्च-वोल्टेज प्रणालियों की सुरक्षित निगरानी के लिए उपयोग होते हैं। ये करंट और वोल्टेज को कम करके स्मार्ट मीटर और सुरक्षा रिले के लिए उपयुक्त संकेत प्रदान करते हैं।
4. औद्योगिक प्रक्रियाएँ (Industrial Applications)
वेल्डिंग ट्रांसफार्मर आर्क वेल्डिंग के लिए समायोज्य वोल्टेज और करंट देते हैं। फर्नेस ट्रांसफार्मर इलेक्ट्रिक आर्क भट्टियों को बहुत कम वोल्टेज और उच्च धारा प्रदान करता है। मध्यम-वोल्टेज ट्रांसफार्मर मोटर, ड्राइव और भारी मशीनरी को ऊर्जा देते हैं। इसका उपयोग उच्च-वोल्टेज परीक्षण उपकरणों में भी किया जाता है।
5. नियंत्रण और स्वचालन (Control & Automation)
कंट्रोल पावर ट्रांसफार्मर 120 V या 24 V AC प्रदान करके PLC, पायलट डिवाइस और अन्य नियंत्रण सर्किट की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। आइसोलेशन ट्रांसफार्मर संवेदनशील उपकरणों को शोर और वोल्टेज स्पाइक्स से बचाते हैं।
6. नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण (Renewable Energy Integration)
पवन टर्बाइन और सौर फार्म में स्टेप-अप ट्रांसफार्मर आउटपुट वोल्टेज को ग्रिड स्तर तक बढ़ाते हैं। बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों को ग्रिड से जोड़ने में ट्रांसफार्मर का उपयोग होता है। आधुनिक स्मार्ट ग्रिड में द्विदिशीय ऊर्जा प्रवाह और हार्मोनिक्स प्रबंधन के लिए स्मार्ट ट्रांसफार्मर का इस्तेमाल बढ़ रहा है।
7. उपभोक्ता और कम बिजली खपत वाले उपकरण (Consumer & Low-Power Devices)
घर और कार्यालय में एसी एडाप्टर, चार्जर, डोरबेल, SMPS, थर्मोस्टेट और LED ड्राइवर जैसे उपकरणों में ट्रांसफार्मर बिजली को सुरक्षित वोल्टेज में बदलने और इन्सुलेशन प्रदान करने का कार्य करते हैं।
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ट्रांसफार्मर के फायदे और सीमाएँ (Advantages & Limitations of Transformer)
ट्रांसफार्मर के फायदे (Advantages):
ट्रांसफार्मर बिजली वितरण और औद्योगिक उपयोग में कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करता है। सबसे पहले, यह वोल्टेज को बढ़ाना या घटाना बहुत आसान बनाता है, जिससे बिजली लंबी दूरी तक कम हानि के साथ भेजी जा सकती है। उच्च दक्षता (95–99%) के कारण ऊर्जा का अधिकतम उपयोग संभव होता है और पारेषण हानियाँ न्यूनतम रहती हैं। इसके अलावा, ट्रांसफार्मर की डिजाइन में स्थिरता और कम मेंटेनेंस की आवश्यकता होती है, जिससे इसकी जीवन अवधि लंबी होती है। यह उपकरण अत्यधिक भरोसेमंद है और बिजली वितरण प्रणालियों में सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
ट्रांसफार्मर की सीमाएँ (Limitations):
हालांकि ट्रांसफार्मर के कई फायदे हैं, इसके कुछ सीमित पहलू भी हैं। यह केवल AC (प्रत्यावर्ती धारा) पर काम करता है और DC (प्रत्यक्ष धारा) के लिए अनुपयुक्त है। बड़े वोल्टेज और पावर रेट के ट्रांसफार्मर का आकार बहुत बड़ा हो सकता है, जिससे स्थान और स्थापना की चुनौतियाँ बढ़ जाती हैं। साथ ही, प्रारंभिक लागत (Initial Cost) अधिक होती है और इसके संचालन के लिए कुशल कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है ताकि तापमान नियंत्रित रहे और कार्यक्षमता बनी रहे।
ट्रांसफार्मर उच्च दक्षता, लंबी उम्र और कम मेंटेनेंस जैसी खूबियों के कारण आधुनिक विद्युत तंत्र का आधार है। हालांकि, इसकी लागत, आकार और AC पर निर्भरता इसे कुछ विशेष परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण बना सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. ट्रांसफार्मर कैसे काम करता है? इसका सिद्धांत और प्रक्रिया क्या है?
ट्रांसफार्मर AC विद्युत ऊर्जा को एक वोल्टेज स्तर से दूसरे वोल्टेज स्तर में बदलने के लिए काम करता है और इसका संचालन फैराडे के विद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत पर आधारित है। जब प्राइमरी वाइंडिंग में AC सप्लाई दी जाती है, तो यह परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न करता है, जो कोर के माध्यम से सेकेंडरी वाइंडिंग तक पहुँचता है। इस बदलते चुंबकीय फ्लक्स के कारण सेकेंडरी वाइंडिंग में EMF (Voltage) प्रेरित होता है। सेकेंडरी वाइंडिंग में मौजूद घुमावों की संख्या के अनुपात के अनुसार आउटपुट वोल्टेज Step-up या Step-down होता है, जिससे ट्रांसफार्मर विभिन्न विद्युत उपकरणों और पावर सिस्टम की जरूरतों के अनुसार कार्य करता है।
2. Step-Up और Step-Down ट्रांसफार्मर के बीच मुख्य अंतर क्या है?
Step-Up और Step-Down ट्रांसफार्मर के बीच मुख्य अंतर यह है कि Step-Up ट्रांसफार्मर इनपुट वोल्टेज को बढ़ाकर आउटपुट वोल्टेज अधिक बनाता है, क्योंकि इसमें सेकेंडरी वाइंडिंग के टर्न्स प्राइमरी से अधिक होते हैं। इसका उपयोग मुख्यतः पावर स्टेशन में लंबी दूरी तक बिजली भेजने के लिए किया जाता है, जिससे करंट कम और I²R लाइन हानि घटती है। वहीं, Step-Down ट्रांसफार्मर उच्च वोल्टेज को घटाकर सुरक्षित वोल्टेज में बदलता है, क्योंकि इसमें सेकेंडरी वाइंडिंग के टर्न्स प्राइमरी से कम होते हैं। इसका उपयोग घरों, दुकानों और छोटे उपकरणों को सुरक्षित वोल्टेज प्रदान करने के लिए किया जाता है।
3. ट्रांसफार्मर की दक्षता क्या होती है और इसका सूत्र क्या है?
ट्रांसफार्मर की दक्षता (Efficiency) यह दर्शाती है कि ट्रांसफार्मर कितनी इनपुट विद्युत ऊर्जा को आउटपुट विद्युत ऊर्जा में प्रभावी रूप से बदलता है। इसे आउटपुट पावर और इनपुट पावर के अनुपात के रूप में व्यक्त किया जाता है।
दक्षता का सूत्र (Formula): Efficiency (%) = (Output Power / Input Power) × 100
यहाँ, आउटपुट पावर में सेकेंडरी वाइंडिंग से प्राप्त विद्युत शक्ति और इनपुट पावर में प्राइमरी वाइंडिंग द्वारा ली गई कुल शक्ति शामिल होती है।
4. ट्रांसफार्मर DC पर काम कर सकता है या सिर्फ AC पर?
ट्रांसफार्मर केवल AC पर ही काम करता है, DC पर नहीं। इसका कारण यह है कि ट्रांसफार्मर का कार्य फैराडे के विद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें बदलते चुंबकीय फ्लक्स की आवश्यकता होती है। AC धारा समय के साथ दिशा और परिमाण बदलती है, जिससे कोर में परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न होता है और सेकेंडरी वाइंडिंग में वोल्टेज प्रेरित होता है। वहीं, DC धारा स्थिर रहती है, जिससे चुंबकीय फ्लक्स में कोई परिवर्तन नहीं होता और सेकेंडरी वाइंडिंग में वोल्टेज उत्पन्न नहीं हो पाता। इसी कारण ट्रांसफार्मर DC पर कार्य नहीं कर सकता।
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